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शुक्रवार, सितंबर 28, 2012

पितृ दोष और श्राद्ध पक्ष मैं केसे करें उनका निवारण .???


पितृ दोष और श्राद्ध पक्ष मैं केसे करें उनका निवारण .??? 
कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं जातक ने अपने पूर्वजों के मृत्योपरांत किये जाने वाले संस्कार तथा श्राद्ध आदि उचित प्रकार से नहीं किये होते जिसके चलते जातक के पूर्वज अर्थात पित्र उसे शाप देते हैं जो पित्र दोष बनकर जातक की कुंडली में उपस्थित हो जाता है तथा जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न करता है।ऐसे ज्योतिषी पित्र दोष के निवारण के लिए पित्रों के श्राद्ध कर्म आदि करने, पिंड दान करने तथा नारायण पूजा, आदि का सुझाव देते हैं जबकि वास्तविकता में इन उपायों को करने वाले जातकों को पित्र दोष कुंडली में सूर्य अथवा कुंडली के नौवें घर पर एक अथवा एक से अधिक अशुभ ग्रहों के प्रभाव से बनता है तथा पित्र दोष निवारण पूजा करवाने के लिए सबसे पहले यह पता होना आवश्यक है कि कुंडली में पित्र दोष बनाने वाला ग्रह कौन सा है। हम यह मान लेते हैं कि कुंडली विशेष में राहु के सूर्य पर अशुभ प्रभाव होने के कारण कुंडली में पित्र दोष बनता है तथा  वेदों के अनुसार पित्रों के लिए किये गये चार प्रकार के विशेष कर्म श्राद्ध कर्म कहलाते हैं तथा ये कर्म हैं हवन, पिंड दान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि अधिकतर जातकों द्वारा किया जाने वाला ब्राह्मण भोजन का कर्म भी एक प्रकार का श्राद्ध कर्म है किन्तु यह कर्म अपने आप में संपूर्ण श्राद्ध नहीं है। वेदों के अनुसार उपर बताये गये चारों प्रकार के श्राद्ध कर्मों का अपना विशेष महत्व है तथा यथासंभव प्रत्येक परिवार में से एक व्यक्ति को पितृ पक्ष के समय अपने मृतक पूर्वजों के लिए ये चारों श्राद्ध कर्म करने चाहिएं।

ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार शास्त्रो में मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण कहे गए है। देव ऋण ,ऋषि ऋण व पितृ ऋण। इसमें से पितृ ऋण के निवारण के लिए पितृ यज्ञ का वर्णन किया गया है। पितृ यज्ञ का दुसरा नाम ही श्राद्ध कर्म है। श्रद्धायंा इदम् श्राद्ध। अर्थात पितरो के उदेश्य से जो कर्म श्रद्धापूर्वक किया जाए,वही श्राद्ध है। महर्षि बृहस्पति के अनुसार जिस कर्म विशेष में अच्छी प्रकार से पकाए हुए उत्तम व्यंजन को दुग्ध घृत और शहद के साथ श्रद्धापूर्वक पितरो के उदेश्य से ब्राह्मणादि को प्रदान किया जाए वही श्राद्ध है।
        
भारतीय संस्कृति में माता पिता को देवता तुल्य माना जाता है। इसलिए शास्त्र वचन है कि पितरो के प्रसन्न होने पर सारे देव प्रसन्न हो जाते है। ब्रह्मपूराण के अनुसार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाला मनुष्य अपने पितरो के अलावा ब्रह्म, इन्द्र, रूद्र, अश्विनी कुमार, सुर्य, अग्नि, वायु, विश्वेदेव, एवं मनुष्यगण को भी प्रसन्न कर देता है।  मृत्यु के पश्चात हमारा स्थूल शरीर तो यही रह जाता है। परंतु सूक्ष्म शरीर यानि आत्मा मनुष्य के शुभाशुभ कर्मो के अनुसार किसी लोक विशेष को जाती है। शुभकर्मो से युक्त आत्मा अपने प्रकाश के कारण ब्रह्मलोक, विष्णुलोक एवं स्वर्गलोक को जाती है। परंतु पापकर्म युक्त आत्मा पितृलोक की ओर जाती है। इस यात्रा में उन्हे भी शक्ति की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति हम पिंड दान द्वारा करते है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत परिवारजनों द्वारा जब उसकी इच्छाओं एवं उसके द्वाराछुटे अधुरे कार्यों को परिवारजनों द्वारा पुरा नही किया जाता। तब उसकी आत्मा वही भटकती रहती है एवं उन कार्यो को पुरा करवाने के लिए परिवारजनों पर दबाव डालती है। इसी कारणपरिवार में शुभ कार्यो में कमी एवं अशुभता बढती जाती है। इन अशुभताओं का कारण पितृदोष माना गया है। इसके निवारण के लिए श्राद्धपक्ष में पितर शांति एवं पिंडदान करना शुभ रहता हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार    ’’पुन्नाम नरकात् त्रायते इति पुत्रम‘‘ एवं ’’पुत्रहीनो गतिर्नास्ति‘‘ अर्थात पुत्रहीन व्यक्तियों की गति नही होती व पुत नाम के नरक से जो बचाता है, वह पुत्र है। इसलिए सभी लोग पुत्र प्राप्ति की अपेक्षा करते है। वर्तमान में पुत्र एवं पुत्री को एक समान माने जाने के कारण इस भावना में सामान्य कमी आई है परन्तु पुत्र प्राप्ति की इच्छा सबको अवश्य ही बनी रहती है जब पुत्र प्राप्ति की संभावना नही हो तब ही आधुनिक विचारधारा वाले लोग भी पुत्री को पुत्र के समान स्वीकारते है। इसमे जरा भी संशय नही है।

पुत्र द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से जीवात्मा को पुत नामक नरक से मुक्ति मिलती है। किसी जातक को पितृदोष का प्रभाव है या नही। इसके बारे में ज्योतिष शास्त्र में प्रश्न कुंडली एवं जन्म कुंडली के आधार पर जाना जा सकता है। पाराशर के अनुसार-

कर्मलोपे पितृणां च प्रेतत्वं तस्य जायते।
तस्य प्रेतस्य शापाच्च पुत्राभारः प्रजायते।।

अर्थात कर्मलोप के कारण जो पुर्वज मृत्यु के प्श्चात प्रेत योनि में चले जाते है, उनके शाप के कारण पुत्र संतान नही होती। अर्थात प्रेत योनि में गए पितर को अनेकानेक कष्टो का सामना करनापडता है। इसलिये उनकी मुक्ति हेतु यदि श्राद्ध कर्म न किया जाए तो उसका वायवीय शरीर हमे नुकसान पहुंचाता रहता है। जब उसकी मुक्ति हेतु श्राद्ध कर्म किया जाता है, तब उसे मुक्ति प्राप्त होने से हमारी उनेक समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाती है। 

ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार   सूर्य को नवग्रहों में से राजा माना जाता है तथा सूर्य हमारी कुंडली में हमारी आत्मा, हमारे पिता, हमारे पूर्वजों, हमारी नर संतान पैदा करने की क्षमता आदि का प्रदर्शन करते हैं जिसके चलते प्रत्येक कुंडली में सूर्य बहुत महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है तथा इसी के कारण सूर्य पर कुंडली में किसी एक या एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ने पर जातक के लिए बहुत सीं समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कुंडली का नौवां घर हमारे पिता, हमारे दादा, हमारे पूर्वजों आदि को दर्शाता है तथा साथ ही साथ कुंडली का नौवां घर हमारे उस भाग्य को भी दर्शाता है जिसका निर्माण हमारे पूर्व जन्म के अच्छे अथवे बुरे कर्मों के फलस्वरूप हुआ है। इसलिए कुंडली का नौवां घर भी कुंडली के बहुत महत्वपूर्ण घरों में से एक माना जाता है क्योंकि भाग्य के बिना तो कोई भी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए किसी कुंडली में सूर्य अथवा कुंडली के नौवें घर के एक अथवा एक से अधिक अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आ जाने पर कुंडली में पित्र दोष बन जाता है जो जातक को उसके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के कष्टों से पीड़ित कर सकता है । ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार   राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है। राहु की अन्य कारक वस्तुओं में लाटरी तथा शेयर बाजार जैसे क्षेत्र, वैज्ञानिक तथा विशेष रूप से वे वैज्ञानिक जो अचानक ही अपने किसी नए अविष्कार के माध्यम से दुनिया भर में प्रसिद्ध हो जाते हैं, इंटरनैट से जुड़े हुए व्यवसाय तथा इन्हें करने वाले लोग, साफ्टवेयर क्षेत्र तथा इससे जुड़े लोग, तम्बाकू का व्यापार तथा सेवन, राजनयिक, राजनेता, राजदूत, विमान चालक, विदेशों में जाकर बसने वाले लोग, अजनबी, चोर, कैदी, नशे का व्यापार करने वाले लोग, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ठग, धोखेबाज व्यक्ति, पंछी तथा विशेष रूप से कौवा, ससुराल पक्ष के लोग तथा विशेष रूप से ससुर तथा साला, बिजली का काम करने वाले लोग, कूड़ा-कचरा उठाने वाले लोग, एक आंख से ही देख पाने वाले लोग तथा ऐसे ही अन्य कई प्रकार के क्षेत्र तथा लोग आते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु द्वारा पित्र दोष बनाये जाने का अर्थ यह होता है कि ऐसे जातक तथा उसके पूर्वजों ने पिछ्ले जन्मों में राहु की विशेषताओं से संबंधित अपराध किये होते हैं अथवा इन विशेषताओं का दुरुपयोग किया होता है जिसके चलते राहु अशुभ होकर ऐसे जातक की जन्म कुंडली में पित्र दोष बनाते हैं। 
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  जिन जातकों के पूर्वजों ने राहु महाराज द्वारा प्रदान की गईं विशेषताओं का दुरुपयोग करके अवैध तथा अनैतिक कार्यों से धन कमाया होता है उन जातकों की कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष बन सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली के छठे घर में अशुभ राहु से बनने वाले पित्र दोष का अर्थ यह हो सकता है कि जातक के पूर्वजों ने अनेक प्रकार के अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन अर्जित किया था जिसके चलते जातक की कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष बनता है जिसके अशुभ प्रभाव में आने के कारण जातक को एक अथवा एक से अधिक गंभीर रोग हो सकते हैं जो जातक को बहुत कष्ट पहुंचाते हैं तथा जो जातक की मृत्यु का कारण भी बनते हैं। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातक अपराधी भी बन सकते हैं तथा ऐसे जातक सामान्यतया अपराध का जीवन आरंभ करने के बाद शीघ्र ही पकड़े जाते हैं तथा इन जातकों को अपने अपराध की तुलना में कहीं अधिक लंबा समय कारावास में व्यतीत करना पड़ सकता है। इस प्रकार के कुछ अन्य जातकों को किसी प्रकार के न्यायालय के निर्णय के चलते धन अथवा संपत्ति की हानि भी उठानी पड़ सकती है। 
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  जिन जातकों के पूर्वजों ने नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार के माध्यम धन कमाया होता है उनकी कुंडली में भी इस प्रकार का पित्र दोष बन सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली के दूसरे घर में बनने वाला इस प्रकार के पित्र दोष का यह अर्थ हो सकता है कि जातक के पूर्वज मादक पदार्थों की अवैध बिक्री करते थे तथा उनका द्वारा बेचे जाने वाले मादक पदार्थों के सेवन से बहुत लोगों को अनेक प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ा था जिसके चलते इस प्रकार का पित्र दोष जातक की कुंडली में बन जाता है जिसके अशुभ प्रभाव के कारण जातक को मादक पदार्थों के सेवन की लत लग सकती है जिसके कारण ऐसे जातक को धन, सम्मान तथा स्वास्थ्य सभी की हानि होती है। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातकों को मादक पदार्थों के निरंतर सेवन के कारण गंभीर रोग लग सकते हैं, इनके शरीर के कुछ अंग इन मादक पदार्थों के सेवन के कारण निष्क्रिय हो सकते हैं तथा इस दोष के कुंडली में बहुत प्रबल होने पर जातक की मादक पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करने के कारण मृत्यु भी हो सकती है। जातक को मिलने वाले इस प्रकार के सभी कष्ट वास्तव में जातक अथवा उसके पूर्वजों के पिछ्ले जन्मों के बुरे कर्मों का फल ही होते हैं। 
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  जिन जातकों के पूर्वजों ने राहु महाराज की कृपा से मिली सत्ता अथवा प्रभुत्व वाले किसी पद का दुरुपयोग किया होता है, उनकी कुंडली में भी इस प्रकार का पित्र दोष बन सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली के चौथे घर में अशुभ राहु से बनने वाले पित्र दोष का अर्थ यह हो सकता है कि जातक के पूर्वजों ने राहु महाराज की विशेषताओं के कारण मिली सत्ता अथवा प्रभुत्व का दुरुपयोग करके निर्दोष लोगों को सताया था तथा अनैतिक ढंग से धन संपत्ति अर्जित की थी जिसके कारण जातक की कुंडली में इस प्रकार का पित्र दोष बन जाता है जिसके अशुभ प्रभाव के कारण जातक को कोई गंभीर मानसिक रोग लग सकता है जिसका उचित उपचार सारा जीवन नहीं हो पाता तथा जिसके कारण जातक को बहुत सा समय किसी मानसिक अस्पताल में व्यतीत करना पड़ सकता है। इस प्रकार के पित्र दोष से पीड़ित कुछ जातकों को किसी ऐसे आरोप के चलते बहुत बदनामी तथा अपयश मिल सकता है जो वास्तव में सच ही न हो तथा वास्तव में ऐसा झूठा आरोप जातक के पिछले जन्मों के बुरे कर्मों के कारण ही जातक को भुगतना पड़ता है। जिन जातकों ने अथवा जिन जातकों के पूर्वजों ने अपने पिछले जन्मों में अपने ससुराल पक्ष को बहुत पीड़ित किया होता है, उन जातकों की कुंडली में भी इस प्रकार का पित्र दोष बन सकता है जिसके चलते इन जातकों के वैवाहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं आतीं हैं तथा बहुत बार इन समस्याओं का कारण जातक का ससुर अथवा साला ही होता है। 
केतु पहले भाव में होने से सूर्य के फल को नष्ट कर देता है एवं चंद्र और राहू एक सांथ होने से ग्रहण दोष बनता जो कई तरह कष्ट कारी है ये पित्र दोष है 
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  सबसे पहले यह पता होना आवश्यक है कि कुंडली में पित्र दोष बनाने वाला ग्रह कौन सा है। हम यह मान लेते हैं कि कुंडली विशेष में राहु के सूर्य पर अशुभ प्रभाव होने के कारण कुंडली में पित्र दोष बनता है तथा इस प्रकार हमें इस पित्र दोष के निवारण के लिए राहु के वेद मंत्र के जाप से पित्र दोष निवारण पूजा करनी होगी। इसी प्रकार नवग्रहों में से भिन्न भिन्न प्रकार के ग्रहों के द्वारा विभिन्न कुंडलियों में बनाए जाने वाले पित्र दोष के निवारण के लिए उसी ग्रह के वेद मंत्र के माध्यम से पित्र दोष निवारण पूजा की जाती है।

कैसे जाने पितृऋण एवं पितृदोष...?????

         संतान की उत्पति में गुणसुत्र का अत्यधिक महत्व है। इन्ही गुणसुत्रो के अलग-अलग संयोग से पुत्र एवं पुत्री की प्राप्ति होती है। शास्त्रो में पुत्र को श्राद्ध कर्म का अधिकारी मुख्यतः माना गया है। पिता के शुक्राणु से जीवात्मा माता के गर्भ मे प्रवेश करती है। उस जीवांश में 84 अंश होते है। जिसमे 28 अंश शुक्रधारी पुरूष अर्थात पिता के होते है। ये 28 अंश पिता के स्वंय के उपार्जित होते है एवं शेष अंश पूर्व पूरूषो के होते है। उसमे से 21 अंश पिता, 15 अंश पितामह के, 10 अंश प्रपितामह के, 6 अंश चतुर्थ पुरूष, 3 अंश पंचम पुरूष व 1 अंश षष्ठ पुरूष का होता है। इस प्रकार सात पीढीयो तक के सभी पूर्वजो के रक्त का अंश हमारे शरीर में विद्यमान होने से हम अपने पूर्वजो के ऋणी है अर्थात हम पर पितृ ऋण रहता है। इसलिए उनको पिंडदान करना चाहिए।
         
ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार पितृदोष होने पर परिवार एवं परिवार जनो को विचित्र प्रकार की घटनाओ का सामना करना पडता है। ऐसे परिवार मे रोग का प्रकोप बना रहता है। किसी एक के स्वस्थ होने पर दुसरा बीमार हो जाता है। कई बार रोग का पता ही नही चल पाता रोगी को थोडी राहत महसुस होती है फिर रोग का पुनः प्रकोप होता रहता है। कई बार इनके कार्य व्यवसाय मे भी अवरोध की स्थिति बनकर घाटा उठाना पडता है। इनके परिवार मे भी मतभेद की स्थिति बनती है। आपस मे कलह के कारण जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। इन सभी प्रकार की अप्रत्भाशित घटनाओ के पीछे पितृदोष ही मुख्य रूप से होता है। इसकी जानकारी जन्मपत्रिका एवं प्रश्न कुंडली के द्वारा जान सकते है। वृह को मुख्य रूप से इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है। यदि जन्मांग में वृह निर्बल, अशुभ, वक्री, अस्त, होकर स्थित हो तो उस जातक के पितर उससे अप्रसन्न रहते है। ऐसे जातक को किस पितर के प्रकोप के कारण इस प्रकार की परेशानियां आ रही है। इसके लिए प्रश्नकुंडली के अष्ट एवं द्वादश भाव में स्थित ग्रह से पता लगाया जा सकता है। प्रत्येक ग्रह को किसी रिश्तेदार का प्रतिनिधि माना जाता है। इसमे सूर्य का पिता का कारक, चंद्र को माता, मंगल को छोटा भाई, बुध को बहन, बुआ, मौसी, वृह को बडे भाई एवं पत्रिका शुक्र को पत्नी का कारक माना जाता है। राहु एवं केतु को प्रेत योनि मे गए पितरो का प्रतिनिधि माना है। इस प्रकार प्रश्न कुंडली में स्थिति के अनुसार पितर दोष के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है। इसके पश्चात कुशल देवज्ञ से शांति कर्म की व्यवस्था करवा सकते है।

पितृ दोष के प्रमुख ज्योतिषिय योग---- ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  
1 -------जब लग्न एवं पंचम भाव में सूर्य , मंगल एवं शनि स्थित हो एवं अष्टम या द्वादश भाव में वृहस्पति राहु से युति कर स्थित हो पितृशाप से संतान नही होती।
2 -----सूर्य को पिता का एवं वृह. को पितरो का कारक माना जाता है। जब ये दोनो ग्रह निर्बल होकर शनि, राहु, केतु के पाप प्रभाव में हो तो पितृदोष होता है।
3 ----------जब अष्टम या द्वादश भाव में कोई ग्रह निर्बल होकर उपस्थित हो तो पितृदोष होता है।
4  -------जब सूर्य, चंद्र एवं लग्नेश का राहु केतु से संबंध होने पर पितृदोष होता है।
5 -----जब जन्मांग चक्र में सूर्य शनि की राशि में हो एवं वृह. वक्री होकर स्थित हो तो ऐसे जतक पितृदोष से पिडित रहते है।
6 -----जब राहु एवं केतु का संबंध पंचम भाव-भावेश से हो तो पितृदोष से संतान नही होती है।
7 ------अष्टमेश एवं द्वादशेश का संबंध सूर्य वृह. से हो तो पितृदोष होता है।
8 -------जब जब वृह. एवं सूर्य नीच नवांश में स्थित होकर शनि राहु केतु से युति-दृष्टि संबंध बनाए तो पितृदोष होता है।

ऐसे करें पितृदोष निवारण---- ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार  
1 ---पितृदोष निवारण के लिए श्राद्ध करे। समयाभाव में भी सर्वपितृ अमावस्या या आश्विन कृष्ण अमावस्या के दिन श्राद्ध अवश्य श्रद्धापूर्वक करे।
2 ------गुरूवार के दिन सायंकाल के समय पीपल पेड की जड पर जल चढाकर सात बार परिक्रमा कर घी का दीपक जलाए।
3 -----प्रतिदिन अपने भोजन मे से गाय, कुते व कौओ को अवश्य खिलाए।
4 ----श्रीमद भागवत कथा पाठ करवाएं / श्रवण करे।
5 ----
पितृदोष शांति हेतु नारायण बली, नागबली आदि करे।
6 -------माह में एक बार रूद्राभिषेक करे। संभव नही होने पर श्रावण मास में रूद्राभिषेक अवश्य करे।
7 ------अपने  कुलदेवी-देवता का पुजन करते रहे।
8 -----श्राद्ध काल में पितृसुक्त का प्रतिदिन पाठ अवश्य करे।
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पितृ सुक्त------
पितृदोष के निवारण के लिए श्राद्ध काल में पितृ सुक्त का पाठ संध्या समय में तेल का दीपक जलाकर करे तो पितृदोष की  शांति होती है।
अर्चितानाम मूर्ताणां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्चक्षुषाम्।।
  हिन्दी- जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यनत तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्य दुष्टि सम्पन्न है, उन पितरो को मै सदा नमस्कार करता है।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।
अर्थात जो इन्द्र आदि देवताओ, दक्ष, मारीच, सप्त ऋषियो तथा दुसरो के भी नेता है। कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता है।
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रूसोस्तयथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान पितृनप्सुदधावपि।।
अर्थात जो मनु आदि राजार्षियों, मुनिश्वरो तथा सूर्य चंद्र के भी नायक है, उन समस्त पितरो को मैं जल और समुद्र मै भी नमस्कार करता है।
नक्षत्राणां ग्रहणां च वाच्व्यग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलि5।।
अर्थात जो नक्षत्रों ,ग्रहो,वायु,अग्नि,आकाश और द्युलोक एवं पृथ्वीलोक के जो भी नेता है, उन पितरो को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
देवर्षिणां जनितंृश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षच्चस्य सदादातृन नमस्येळहं कृतांजलिः।।
अर्थात जो देवर्षियो के जन्मदाता, समस्त लोको द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता है। उन पितरो को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
अर्थात प्रजापति, कश्यप, सोम,वरूण तथा योगेश्वरो के रूप् में स्थित पितरो को सदा हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयंभूवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
अर्थात सातो लोको मे स्थित सात पितृगणो को नमस्कार है। मै योगदृश्टि संपन्न स्वयंभू ब्रह्मजी को प्रणाम करता है।
सोमाधारान् पितृगणानयोगमूर्ति धरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अर्थात चंद्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित और योगमूर्तिधारी पितृगणों को मै प्रणाम करता हूँ। साथ ही संपूर्ण जगत के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।
अग्निरूपांस्तथैवान्याम् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।
अर्थात अग्निस्वरूप् अन्य पितरो को भी प्रणाम करता हूँ क्याकि यह संपूर्ण जगत अग्नि और सोममय है।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैवतथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।
अर्थात जो पितर तेज मे स्थित है जो ये चन्द्रमा, सूषर्् और अग्नि के रूप् मै दृष्टिगोचर होते है तथा जो जगतस्वरूप् और ब्रह्मस्वरूप् है।
तेभ्योळखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।
अर्थात उन संपूर्ण योगी पितरो को मै। एकाग्रचित होकर प्रणाम करता है। उन्हे बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हो।
विशेष- यदि आप संस्कृत पाठ नही कर सके तो हिन्दी में पाठ कर भी पितृ कृपा प्राप्त कर सकते है। 
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ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री(मोब.-09024390067 ) के अनुसार किसी भी प्रकार के दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस दोष के निवारण के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर दोषों के लिए की जाने वाली पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है। पित्र दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी पित्र दोष के निवारण मंत्र अर्थात वेद मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है।
पूर्ण पित्रदोष शांती हेतु पित्रपक्ष में वैदिक अनुष्ठान के साथ श्रीमद् भागवत कथा का मूल पाठ कराने से पूर्ण लाभ प्राप्त होगा 

जल व पिंडदान का विशेष महत्त्व हें श्राद्ध पक्ष में----


जल व पिंडदान का विशेष महत्त्व हें श्राद्ध पक्ष में----

भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता व परिवार के मृतकों के नियमित श्राद्ध करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। श्राद्ध कर्म को पितृकर्म भी कहा गया है व पितृकर्म से तात्पर्य पितृपूजा भी है।

अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह, विनम्रता, आदर व श्रद्धा भाव से किया जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है। यह पितृ ऋण से मुक्ति पाने का सरल उपाय भी है। इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन (कुंवार) माह की अमावस्या तक के यह सोलह दिन श्राद्धकर्म के होते हैं। 

इस वर्ष श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 30  सितंबर,2012 (
रविवार) से होकर उसका समापन 15 अक्तूबर,2012 (सोमवार) को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या को होगा। महर्षि पाराशर के अनुसार देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधि से जो कर्म यव (तिल) व दर्भ (कुशा) के साथ मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धापूर्वक किया जाता है वह श्राद्ध होता है। 

भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता व परिवार के मृतकों के नियमित श्राद्ध करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। श्राद्ध कर्म को पितृकर्म भी कहा गया है व पितृकर्म से तात्पर्य पितृपूजा भी है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। श्राद्घ की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पित्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्घापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्घ है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है।

पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेत का अंश लेकर वह चंद्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है।

ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्घ करने से वह पित्तरों को प्राप्त होता 

धर्मशास्त्रों अनुसार पितरों का निवास चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। यह आत्माएं मृत्यु के बाद एक वर्ष से लेकर सौ वर्ष तक मृत्यु और पुनर्जन्म की मध्य की स्थिति में रहते हैं। पितृलोक के श्रेष्ठ पितरों को न्यायदात्री समिति का सदस्य माना जाता है।

अन्न से शरीर तृप्त होता है। अग्नि को दान किए गए अन्न से सूक्ष्म शरीर और मन तृप्त होता है। इसी अग्निहोत्र से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है।

पितरों का आगमन :------ 
पं. दयानन्द शास्त्री (मोब.-09024390067 ) के अनुसार सूर्य की सहस्त्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम 'अमा' है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य त्रैलोक्य को प्रकाशमान करते हैं। उसी अमा में तिथि विशेष को चंद्र (वस्य) का भ्रमण होता है, तब उक्त किरण के माध्यम से चंद्रमा के उर्ध्वभाग से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि का महत्व भी है।

अमावस्या के साथ मन्वादि तिथि, संक्रांति काल व्यतिपात, गजच्दाया, चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण इन समस्त तिथि-वारों में भी पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जा सकता है।

पित्र स्तुती ------
ये रोज़ प्रातः और संध्या समय किया जाता है.. संध्या समय काफी उत्तम रहता है... ये पाठ प्रतिदिन भी कर सकते है.. मै ये पाठ हिंदी में दे रहा हु.. आशा करता हु की आप सब को पित्र देवो का आशीर्वाद प्राप्त होगा... धुप - दीप करके पाठ का आरम्भ करे... कल संध्या समय से शुरू कर सकते है.... 
" जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यंत तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्य द्रष्टि संम्पन्न है, उन पितरो को मै सदा नमस्कार करता हु. जो इन्द्र आदि देवताओ, दक्ष, मारीच, सप्त ऋषियों तथा दुसरो के भी नेता है. कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मै प्रणाम करता हु...जो मनु आदि राजऋषियों, मुनीश्वरो तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक है, उन समस्त पितरो को मै जल और समुन्द्र में भी नमस्कार करता हु. जो नक्षत्रो, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और घुलोक तथा पृथ्वीलोक के जो भी नेता है, उन समस
्त पितरो को मै हाथ जोड़कर प्रणाम करता हु. जो देव ऋषियों के जन्मदाता, समस्त लोको द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता है, उन पितरो को हाथ जोड़कर प्रणाम करता हु. प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण तथा योगेश्वारो के रूप में स्थित पितरो को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हु. सातो लोको में स्थित सात पित्रगनो को नमस्कार करता हु. मै योगदृष्टि संम्पन्न स्वयंभू ब्रह्मा जी को प्रणाम करता हु. चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित और योगमुर्तिधारी पित्रगनो को मै प्रणाम करता हु. साथ ही संपूर्ण जगत के पिता सोम को नमस्कार करता हु. अग्निस्वरुप अन्य पितरो को भी प्रणाम करता हु क्यूंकि यह संपूर्ण जगत अग्नि और सोममय है. जो पित्र तेज में स्थित है, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते है तथा जो जगतस्वरुप और ब्रहमस्वरुप है, उन संपूर्ण योगी पितरो को मै एकाग्रचित होकर प्रणाम करता हु. उन्हें बारम्बार नमस्कार है. वे स्वधाभोजी पित्र मुझ पर प्रसन्न हो. " 

दिव्य पितर की जमात के सदस्यगण :------- अग्रिष्वात्त, बर्हिषद आज्यप, सोमेप, रश्मिप, उपदूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक व नान्दीमुख ये नौ दिव्य पितर बताए गए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनी कुमार भी केवल नांदीमुख पितरों को छोड़कर शेष सभी को तृप्त करते हैं।

अर्यमा :------ आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की किरण (अर्यमा) और किरण के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। पितरों में श्रेष्ठ है अर्यमा। अर्यमा पितरों के देव हैं। ये महर्षि कश्यप की पत्नी देवमाता अदिति के पुत्र हैं और इंद्रादि देवताओं के भाई। पुराण अनुसार उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है।

इनकी गणना नित्य पितरों में की जाती हैं। जड़-चेतनमयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध के समय इनके नाम से जल दान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का 'हव्य' और श्राद्ध में स्वधा का 'कव्य' दोनों स्वीकार करते हैं।

सूर्य किरण का नाम अर्यमा :----- - 
देसी महीनों के हिसाब से सूर्य के नाम हैं - चैत्र मास में धाता, वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में- मित्र, आषाढ़ में वरुण, श्रावण में- इंद्र, भाद्रपद में- विवस्वान, आश्विन में पूषा, कार्तिक-पर्जन्य, मार्गशीर्ष में-अंशु, पौष में- भग, माघ में- त्वष्टा एवं फाल्गुन में विष्णु। इन नामों का स्मरण करते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।

।।अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥29॥ - गीता


भावार्थ : हे धनंजय! नागों में मैं शेषनाग और जलचरों में वरुण हूं; पितरों में अर्यमा तथा नियमन करने वालों में यमराज हूं।

पुराणों के अनुसार मुख्यत: पितरों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है - दिव्य पितर और मनुष्य पितर। दिव्य पितर उस जमात का नाम है जो जीवधारियों के कर्मों को देखकर मृत्यु के बाद उसे क्या गति दी जाए, इसका निर्णय करता है।

इस जमात का प्रधान यमराज है। अत: यमराज की गणना भी पितरों में होती है। काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा और यम- यह चार इस जमात के सदस्य हैं।

यमे नाम: वायव: : ---


पं. दयानन्द शास्त्री (मोब.-09024390067 ) के अनुसार वेदों में उल्लेखित है कि यम नाम की एक प्रकार की वायु होती है। देहांत के बाद कुछ आत्माएं उक्त वायु में तब तक स्थित रहती हैं जब तक कि वे दूसरा शरीर धारण नहीं कर लेतीं। 'मार्कण्डेय पुराण' अनुसार दक्षिण दिशा के दिकपाल और मृत्यु के देवता को यम कहते हैं। वेदों में 'यम' और 'यमी' दोनों देवता मंत्रदृष्टा ऋषि माने गए हैं। वेदों के 'यम' का मृत्यु से कोई संबंध नहीं था पर वे पितरों के अधिपति माने गए हैं।

यम के लिए पितृपति, कृतांत, शमन, काल, दंडधर, श्राद्धदेव, धर्म, जीवितेश, महिषध्वज, महिषवाहन, शीर्णपाद, हरि और कर्मकर विशेषणों का प्रयोग होता है। अंग्रेजी में यम को प्लूटो कहते हैं। योग के प्रथम अंग को भी यम कहते हैं। दसों दिशाओं के दस दिकपालों में से एक है यम। 

दस दिकपाल :----
इंद्र, अग्नि, यम, नऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईश्व, अनंत और ब्रह्मा।

महर्षि पुलस्त्य के अनुसार जिस कर्मविशेष में दूध, घृत और मधु से युक्त अच्छी प्रकार से पके हुए पकवान श्रद्धापूर्वक पितृ के उद्देश्य से गौ, ब्राह्मण आदि को दिए जाते हैं वही श्राद्ध है। अतः जो लोग विधिपूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करते हैं वह सभी पापों से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। उनका संसार में चक्र छूट जाता है। 
इसीलिए चाहिए कि पितृगणों की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। कहा है कि श्राद्ध करने वाले की आयु बढ़ती है पितृ उसे श्रेष्ठ संतान देते हैं, घर में धन-धान्य बढ़ने लगता है, शरीर में बल, पौरुष बढ़ने लगता है एवं संसार में यश और सुख की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध कर्म में गया तीर्थ का स्मरण करते हुए 'ॐ गयायै नमः' तथा गदाधर स्मरण करते हुए 'ॐ गदाधराय नमः' कहकर सफेद पुष्प चढ़ाने चाहिए। साथ ही तीन बार 'ॐ श्राद्धभूम्यै नमः' कहकर भूमि पर जौ एवं पुष्प छोड़ने चाहिए
आधुनिकता के वेग में नई उम्र के कई लोगों को यह मालूम नहीं होता कि श्राद्ध किस तरह से किया जाता है और इससे जुड़े विधि-विधान क्या हैं?

श्राद्धकर्ता को स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए दो वस्त्र धोती और उत्तरीय धारण करना चाहिए। गौमय से लिपी हुई शुद्ध भूमि पर बैठकर श्राद्ध की सामग्रियों को रखकर सबसे पहले भोजन का निर्माण करना चाहिए। उसके बाद ईशान कोण में पिण्ड दान के लिए पाक सामग्री रख लें। साथ ही वहीं पर खीर का कटोरा भी स्थापित कर देना चाहिए। उसके बाद विप्र भोज के लिए रखे हुए भोजन में तुलसीदल डालकर भगवान का भोग लगाना चाहिए।

श्राद्ध कर्ता को गायत्री मंत्र पढ़ते हुए शिखाबंधन करने के बाद श्राद्ध के लिए रखा हुआ जल छिड़कते हुए सभी वस्तुओं को पवित्र कर लेना चाहिए। उसके बाद तीन बार आचमनी करें हाथ धोकर विश्वदेवों के लिए दो आसन दें। उन दोनों आसनों के सामने भोजन पात्र के रूप में पलाश अथवा तोरी का एक-एक पत्ता रख दें भोजन के उत्तर दिशा में जल भरा हुआ दोना रखकर पूर्वजों के निमित्त वेद मंत्रों के साथ श्राद्ध एवं तर्पण करना चाहिए।

धर्मशास्त्रोक्त सभी ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक मधु, डेढ़ प्रहर तक दुग्ध, साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप से पितृ को प्राप्त होता है। श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर पितृ तीर्थ यानी अंगूठे की ओर से धरती में छोड़ने से पितर को तृप्ति मिलती है। 

पितरों की पद वृद्घि तथा तृप्ति के लिए स्वयं श्राद्घ करना चाहिए। पितरों के लिए श्रद्घा से क्रमानुसार वैदिक पद्घति से शांत चित्त होकर किया कर्म श्राद्घ कहलाता है। शास्त्र में सुस्पष्ट है कि नाम व गौत्र के सहारे स्वयं के द्वारा किया श्राद्घ पितरों को विभिन्न योनियों में प्राप्त होकर उन्हें तृप्त करता है।

पं. दयानन्द शास्त्री (मोब.-09024390067 ) के अनुसार यम स्मृति तथा निर्णय सिंधु के आधार पर जब सूर्य कन्या राशि में अवस्थित हो, तब पितृ अपने पुत्र-पौत्र की ओर देखते हैं। अपनी तृप्ति व पद वृद्घि के हेतु जल व पिंडदान की आशा करते हैं। सूर्यसंहिता के आधार पर पितृ वर्ष में साढ़े दस महीने अपनी ऊर्जा द्वारा पुत्र-पौत्रों को शुभ-आशीष प्रदान करते हैं।

पुत्र पौत्रों द्वारा दिए गए जल व पिंडदान से उन्हें ऊर्जा मिलती है। जब पितरों के निमित्त जल व पिंड दान नहीं किया जाता है, तब पितृ क्लेश करते हैं। कर्तव्य स्वरूप स्वयं द्वारा पितरों के निमित्त श्राद्घ करने से वह सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। तृप्त होकर पितृ अपने वंशजों को आशीर्वाद, सुख-समृद्घि प्रदान करते हैं। 

श्राद्ध कर्म

पितृ अत्यंत दयालु तथा कृपालु होते हैं, वह अपने पुत्र-पौत्रों से पिण्डदान तथा तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा पितृ को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। पितृगण प्रसन्न होकर दीर्घ आयु, संतान सुख, धन-धान्य, विद्या, राजसुख, यश-कीर्ति, पुष्टि, शक्ति, स्वर्ग एवं मोक्ष तक प्रदान करते हैं। 

कैसे प्राप्त होता है श्राद्घ ...????

यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि श्राद्घ में दी गई अन्न आदि सामग्री पितरों को कैसे प्राप्त होती है। विभिन्न कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद जीव को भिन्न योनियां प्राप्त होती हैं। कोई देवता, पितृ, प्रेत, हाथी, चींटी तथा कोई चिनार का वृक्ष या तृण बनता है। श्राद्घ में दिए गए छोटे से पिंड से हाथी का पेट कैसे भर सकता है। छोटी-सी चींटी इतना बड़ा पिंड कैसे खा सकती है और देवता तो अमृत से तृप्त होते हैं। पिंड से उन्हें कैसे तृप्ति मिल सकती है। 
शास्त्रों का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देव योनि प्राप्त होती है तो वह अमृत रूप में उनको प्राप्त होता है। उन्हें गन्धर्व लोक प्राप्त होने पर भोग्य रूप में, पशु योनि में तृण रूप में, सर्प योनि में वायु रूप में, यक्ष रूप में पेय रूप में, दानव योनि में मांस के रूप में, प्रेत योनि में रुधिर के रूप में और मनुष्य योनि में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।

जब पित्तर यह सुनते हैं कि श्राद्घकाल उपस्थित हो गया है, तो वे एक-दूसरे का स्मरण करते हुए मनोनय रूप से श्राद्घस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तब पित्तर अपने पुत्र-पौत्रों के यहां आते हैं।

विशेषतः आश्विन-अमावस्या के दिन वे दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्घ नहीं किया जाता तब वे श्राप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प-फल और जल-तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्घ विमुख नहीं होना चाहिए।

पं. दयानन्द शास्त्री (मोब.-09024390067 ) के अनुसार इन प्रश्नों का शास्त्र में उत्तर दिया गया है कि नाम व गौत्र के सहारे विश्वदेव एवं अग्नि ख्वाता आदि दिव्य पितरों को हव्य (हवन) तथा काव्य (पितरों के निमित्त ब्रह्मभोज) के द्वारा पदार्थ प्राप्त करा देते हैं। इसका प्रमाण मार्कंडेय पुराण, वायु पुराण तथा श्राद्घ कल्पलता में मिलता है।