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शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2015

अशुभ मंगल या मंगल दोष के कारण होने वाले रोग/बीमारियां -- एक ज्योतिषिय विश्लेषण

|| अशुभ मंगल या मंगल दोष के कारण होने वाले रोग/बीमारियां -- एक ज्योतिषिय विश्लेषण  ||

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्र, शनि, राहु एवं केतु के रूप में नौ ग्रह होते हैं। सामान्य रूप से बृहस्पति (गुरु), बुध और चंद्रमा को शुभ ग्रह माना जाता है और सूर्य, मंगल, शनि, राहु एवं केतु अशुभ ग्रह माने जाते हैं। इन अशुभ ग्रहों को ही रोगकारक माना जाता है। विशिष्ट और विपरीत ग्रहदशा में सभी ग्रह अपना अशुभ प्रभाव छोड़ते हैं।हर किसी के जीवन में रोग और पीड़ाएं आती रहती हैं। ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति के जीवन में पीड़ा और रोगों के लिए ग्रह नक्षत्र ही जिम्मेदार होते हैं। कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार मंगल ग्रह व्यक्ति के रक्त मज्जा और हड्डीयों पर प्रभुत्व रखता है। मंगल ही रोग और विकारों का शमन कर लंबी आयु प्रदान करता है।

ग्रहों की प्रतिकूलता मनुष्य और वातावरण के बीच के ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित करती है। इसके इस असंतुलन के प्रभाव से विभिन्न प्रकार के रोग, विकार पनपते हैं। चूंकि सूर्य पित्त प्रकृति को बढ़ावा देता है, अत: इसका कमजोर एवं बलवान होना, दोनों ही दशा में समस्या खड़ी होती है।सौर मंडल में मंगल का अपना स्थान है। मंगल भी धरती को कई सारी आपदाओं से बचाता है। मंगल ग्रह धरती को शनि, राहु और केतु के बुरे प्रभाव से भी बचाता है। मंगल के कारण ही समुद्र में मूंगे की पहाड़ियां जन्म लेती हैं और उसी के कारण प्रकृति में लाल रंग उत्पन्न हुआ है।मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है.मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.


















ज्योतिष के अनुसार मंगल की चार भुजाएँ है | इनके शारीर के रोए लाल है तथा इनके हाथो में अभय मुद्रा, त्रिशूल, गदा और वर मुद्रा है | इन्होने लाल माला और लाल वस्त्र धारण कर रखे है | इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट है तथा ये मेष ( मेंढा ) के वहां पर स्वर है | ज्योतिष में मंगल को क्रूर ग्रह माना गया है जिसका अर्थ अग्नि के समान लाल है, इसलिए इसे अंगारक भी कहते है | वे स्वतंत्र प्रकृति के तथा अनुशासन प्रिय है | 

इस ग्रह से प्रभावित जातक सेनाध्यक्ष या राजदूत आदि होते है या उच्च पदों पर कार्य करते है | उनमे नेतृत्व शक्ति विशेष होती है | वे निडर होते है, किसी भी प्रकार का जोखिम ले सकते है | खिलाडी, वायुसेना, थलसेना, नौसेना के अध्यक्ष तथा उच्च पदों पर आसीन राजनीतिज्ञ मंगल से प्रभावित माने जाते है | मंगल को भौम, कुज आदि नामो से भी जाना जाता है | नवग्रहों में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गई है | 

शारीरिक तौर पर मंगल प्रभावित जातक स्वस्थ और माध्यम लम्बे कद के होते है | कमर पतली, छाती चौड़ी, बाल घुंगराले और आँखे लाल होती है | उनके चेहरे पर तेज होता है | मंगल मेष एवं वृशिक राशी के स्वामी है | मृगशिरा, चित्रा और घनिष्ठा नक्षत्रो का स्वामित्व भी मंगल को ही प्राप्त है | मंगल तृतीय एवं षष्ठ भाव के कारक ग्रह है | कर्क एवं सिंह लग्न की कुंडली में विशेष कारक माने जाते है एवं मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यह विशेष अकारक ग्रह बन जाते है | 

मंगल मकर राशि में उच्च एवं कर्क राशि में नीच के होते है | जन्म-कुंडली में मंगल जिस भाव में स्थित होते है, उस भाव से सम्बंधित कार्य को अपनी स्थिति के अनुसार सुदृढ़ करते है | शुभ मंगल, मंगलकारी और अशुभ मंगल, अमंगलकारी कार्य करवाते है | मंगल शक्ति, साहस, क्रोध, युद्ध, दुर्घटना, षड़यंत्र, बीमारियों, विवाद, भूमि सम्बन्धी आदि कार्यो का कारक ग्रह है | मंगल तांबे, खनिज पदार्थो , सोने, मूंगे, हथियार, भूमि आदि का प्रतिनिधित्व करता है | 

मंगल पित्त कारक है। यह अत्यंत उग्र है एवं उत्तेजना पैदा करता है। यह सिर, मज्जा, पित्त, हीमोग्लोबिन तथा गर्भाशय का नियमन करता है। अत: इससे संबंधित सभी रोग मंगल के प्रकोप से होते हैं। मंगल दुर्घटना, चोट, मोच, जलन, शल्यक्रिया, उच्चरक्तचाप, पथरी, हथियारों एवं विष से क्षति देता है।मंगल के कारण ही गर्मी के रोग, विषजनित रोग, व्रण, कुष्ठ, खुजली,रक्त सम्बन्धी रोग, गर्दन एवं कण्ठ से सम्बन्धित रोग,रक्तचाप, मूत्र सम्बन्धी रोग, ट्यूमर, कैंसर, पाइल्स, अल्सर,दस्त, दुर्घटना में रक्तस्त्राव, कटना, फोड़े-फुन्सी, ज्वर,अग्निदाह, चोट इत्यादि बीमारियां/रोग होते हैं | 
---जब मंगल-शनि की युति हो तो रक्त विकार, कोढ़या जिस्म का फट जाना आदि रोग से कष्ट होगा अथवा दुर्घटना से चोट-चपेट लगने के कारण कष्ट होता है।
--गुरु-मंगल या चन्द्र-मंगल की युति हो तो पीलिया रोग से कष्ट होता है।
--मंगल-राहु या केतु-मंगल की युति हो तो शरीर में टयूमर या कैंसर से कष्ट होगा।
मनुष्य के शरीर में मंगल शिराओं व धमनियों की टूट-फूट, अस्थि मज्जा के रोग, रक्त्रस्राव, गर्भपात, मासिक धर्म में अनियमितता, सुजाक गठिया और दुर्घटना तथा जलना का प्रतिक है | मंगल किसी भी जातक के शरीर में रक्त,उत्तेजना,बाजू,क्रूरता,साहस,कान का करक होता हैं |मंगल अशुभ होने पर रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े एवं जिगर के रोग भी हो सकते हैं | 

जब कभी अशुभ मंगल अमंगलकारी हो जाता है | जिसके प्रभाव से जातक आतंकवादी, दुराचारी, षड्यंत्रकारी और विद्रोही बनता है | इन सभी से बचने के श्री अंगारेश्वर महादेव पर भात पूजा द्वारा मंगलदोष शांति अवश्य करवाना चाहिये | मंगल ग्रह की शांति के लिए शिव उपासना एवं मूंगा रत्ना धारण करने का भी विधान है |

यदि आपकी कुंडली में मंगलदोष है या आपकी तरक्की में यह आड़े आ रहा है तो आप रक्तदान कर इससे शांति पा सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रक्त दान मंगल दोष से मुक्ति दिलाने में भी सहायक है। रक्त दान से रक्त का शोधन होता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। इस तरह कई बीमारियां दूर रहती हैं। दान को शास्त्रों में भी महान बताया गया है। ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि रक्त मंगल का कारक है। इसके दान से मंगल (भौम) ग्रह दोष से मुक्ति मिलती है। जिन जातकों के लग्न में तीसरे, ११वें अथवा छठे, 12वें स्थान में मंगल हो उन्हें विशेष रूप से रक्त दान करना चाहिए।

इससे जीवन में शांति बनी रहती है। रक्तदान से ब्लड में कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम होती है। इस तरह हार्ट संबंधी बीमारियों से बचा जा सकता है। साथ ही हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) के कारण पैरालिसिस या ब्रेन हेमरेज की आशंका नहीं रहती है।यह ऑक्सीजन पार्लर का काम करता है। नए रक्त कण बोनमैरो से आने पर शरीर तरोताजा और स्वस्थ्य महसूस करता है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, बुखार, हेपेटाइटिस बी व सी, मलेरिया, एचआईवी, हीमोग्लोबीन, ब्लड ग्रुप की भी जांच हो जाती है।

अशुभ मंगल के कारण होने वाले कुछ मुख्य रोग/बीमारियां--
---उच्च रक्तचाप।
----वात रोग।
---गठिया रोग।
---फोड़े-फुंसी होते हैं।
---जख्मी या चोट।
---बार-बार बुखार आता रहता है।
---शरीर में कंपन होता रहता है।
---गुर्दे में पथरी हो जाती है।
---आदमी की शारीरिक ताकत कम हो जाती है।
---एक आंख से दिखना बंद हो सकता है।
---शरीर के जोड़ काम नहीं करते हैं। 
----मंगल से रक्त संबंधी बीमारी होती है। रक्त की कमी या अशुद्धि हो जाती है।
---बच्चे पैदा करने में तकलीफ। हो भी जाते हैं तो बच्चे जन्म होकर मर जाते हैं। 

हमारे शास्त्रों में हर विलक्षण वस्तु दान करने के लिए कही गई है। देह दान, नेत्र, अंग और रक्त दान का अपना महत्व है। ज्योतिष शास्त्र की बात करें तो रक्त को मंगल का कारक माना गया है। मंगलदोष से मुक्ति का एक माध्यम रक्तदान भी कम जिसके कारण रक्तदान करने वाले को चोरी, अग्नि समेत अन्य आकस्मिक भय नहीं सताते।

यहाँ दिए गए सभी रोग प्रायः युति कारक ग्रहों की दशार्न्तदशा के साथ-साथ गोचर में भी अशुभ हों तो ग्रह युति का फल मिलता है! इन योगों को कुंडली में देखकर विचार सकते हैं। ऐसा करके आप होने वाले रोगों का पूर्वाभास करके स्वास्थ्य के लिए सजग रह सकते हैं।

!! जानिए की कैसे होती हैं मंगलदोष शमन के लिए भात पूजा !!

मंगलदोष के शमन का सरल एवं अचूक उपाय मंगल ग्रह का भात पूजन है | जिसके अनुसार सर्वप्रथम पंचांग कर्म जिसमे गणेशाम्बिका पूजन , पुण्याहवाचन, षोडश मातृका पूजन, नान्दी श्राद्ध एवं ब्राह्मन पूजन किया जाता है | तत्पश्चात भगवान श्री अंगारेश्वर पर मंगल देव का दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, अष्टगंध, इत्र एवं भांग से स्नान करा कर मंगल स्त्रोत का पाठ किया जाता है | शिव के रूप में होने के कारण रुद्राभिषेक या शिवमहिम्न स्त्रोत का पाठ किया जाता है | उसके बाद पके हुए चावल को ठंडाकर उसमे पंचामृत मिलाकर श्री अंगारेश्वर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है एवं आकर्षक श्रृंगार किया जाता है | षोडशोपचार पूजन एवं आरती करके अग्नि स्थापन, नवग्रह एवं रूद्र स्थापन पूजन कर हवन किया जाता है | 

विद्वानों के अनुसार मंगल ग्रह की प्रकृति गर्म है | अत: शीतलता एवं मंगल दोष की निवृत्ति के लिए भगवान मंगलदेव को भात चढ़ाया जाता है | मंगल दोष युक्त जातक जिनके विवाह में बाधा आ रही हो उन्हें श्री अंगारेश्वर पर अवश्य ही मंगलदोष निवारण के लिए भात पूजन करवाना चाहिये |

मंगल पूजा :---- 
"ॐ भौमाय नम :" पूजा, का अर्थ है, भक्ति और श्रद्धा | पूजा शब्द को 'पु-जय' या पूजा से व्युत्पन्न माना जाता है, अब शब्द पूजा को पूजा के सभी रूपों जैसे साधारण दैनिक प्रसाद से लेकर फल, फुल, पत्ते, चावल मिठाइयाँ, मंदिरों और घरों में देवताओं को समर्पित करने के लिए किया जाता है, पूजा के तीन प्रकार होते हैं: "दीर्घ", "मध्य" और "लघु" | पूजा केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि अधिकांशतः घरों में दिनों के कार्यक्रम का आरंभ भगवान की पूजा से की जाती है | जागरण / भजन / कीर्तन / रामायण या ग्रंथों का अध्ययन/ पूजा अनुष्ठान का उद्देश्य हमारे चारों ओर आध्यात्मिक बलों की स्थापना है | 

श्री अंगारेश्वर महादेव (उज्जैन, मध्यप्रदेश) पर मंगलदोष निवारण हेतु  पूजा-अनुष्ठान का उद्देश्य बाधाओं को हटाना है | जो जप करके प्राप्त किया जाता है. विशिष्ट पूजा के द्वारा हम हानिकर बल से छुटकारा, सुख, शांति और समृद्धि पा सकते है | नए उद्यम शुरू करने में सकारात्मक कंपन पैदा करने के लिए, घर, नौकरी, व्यवसाय में बाधाएं दूर करने के लिए, शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए, नेतृत्व कौशल बढ़ाने के लिए हम साधना करके लाभ बढ़ा सकते हैं | सामान्य तरीकों में ध्यान, मंत्र जप, शांति, प्रार्थना शामिल हैं | उपवास या भगवान का नाम जप, धर्मदान. ये मनोरथ से किया जा सकता है | 

श्री अंगारेश्वर पर मंगल पूजा (भात पूजन), मंगल ग्रह के लिए समर्पित है | मंगलदोष शांति पूजा ऋण, गरीबी और त्वचा की समस्याओं से राहत के लिए लाभकारी है | इन कार्यों के परिणाम के लिए सक्षम हो हमें और अधिक गहरा आध्यात्मिक पूजा द्वारा लागू ऊर्जा आत्मसात करने के लिए मंगलदेव की भात पूजा श्री अंगारेश्वर महादेव (उज्जैन, मध्यप्रदेश) पर करने की ज़रूरत है |

मंगलदोष निवारण के लिए इनका करें दान--- मूंगा, गेहूं, मसूर, लाल वस्त्र, कनेर पुष्प, गुड़, तांबा,लाल चंदन, केसर.

गुरुवार, फ़रवरी 26, 2015

जानिए मंगलदोष शांति के उपाय

जानिए मंगलदोष शांति के उपाय: ----

वैसे तो हमारे सभी वैदिक ग्रंथों और ज्योतिषीय ग्रंथों में मंगलदोष निवारण के अनेकानेक उपाय बताये गए हैं  जैसे---

1 लाल पुष्पों को जल में प्रवाहीत करें।
2 मंगलवार को गुड़ व मसूर की दाल जरूर खायें।
3 मंगलवार को रेवडि़या पानी में विसर्जित करें।
4 आटे के पेड़े में गुड व चीनी मिलाकर गाय को खिलायें।
5 मीठी रोटियों का दान करें।
6 ताँबे के तार में डाले गये रूद्राक्ष की माला धारण करें।
7 मंगलवार को शिवलिंग पर जल चढ़ावे।
8 बन्दरों को मीठी लाल वस्तु जैसे - जलेबी, इमरती, शक्करपारे आदि खिलावे।
9 शिवजी या हनुमान जी के नित्य दर्शन करें और हनुमान चालीसा या महामृत्युन्जय मंत्र की रोजाना कम से कम एक माला का जाप करे। हनुमान जी के मन्दिर में दीपदान करें तथा बजरंग बाण का प्रत्येक मंगलवार को पाठ करे।
10 गेहूँ , गुड़, मंूगा, मसूर, तांबा, सोना, लाल वस्त्र, केशर - कस्तूरी, लाल पुष्प , लाल चंदन , लाल रंग का बैल, धी, पीले रंग की गाय, मीठा भोजन आदि लाल वस्तुओं का दान मंगलवार मध्यान्ह में करें। दीन में मंगल यंत्र का पूजन करें। मंगलवार को लाल वस्त्र पहने।
11 शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से 21 या 45 मंगलवार तक अथवा पूरे वर्ष मंगलवार का व्रत करें। गुड़ का बना हलवा भोग लगाने व प्रसाद बाँटने के काम में लाये और सांयकाल को वही प्रसाद ग्रहण करें।
12 जिस मंगलवार को व्रत करें उस दिन बिना नमक का भोजन एक बार विधिवत मंगल की पूजा अर्चना कर ग्रहण करें।
13 पति-पत्नि दोनों एक साथ रसोई में बैठकर भोजन करें।
14 स्नान के बाद सूखे वस्त्र को हाथ लगाने से पहले पूर्व दिशा में मुँह करके सूर्य का अर्ध देकर प्रणाम करें। (सूर्य देव दिखाई दे या न दे)
15 शयन कक्ष में पलंग पर काँच लगे हो तो उन्हें हटा दे, मंगल का कोप नहीं रहेगा अन्यथा उस काँच में पति - पत्नि का जो भी अंग दिखाई देगा वह रोगग्रस्त हो जायेगा।
16 मन का कारक चन्द्रमा होता हैं जिसके कारण मन को चंचलता प्राप्त होती हैं। पति-पत्नि के बीच जब भी वाद-विवाद हो, उग्रता आने लगे तब दोनों में से कोई एक उस स्थान से हट जायें, चन्द्र संतुलित रहेगा।
17 शयन कक्ष में यदि रोजाना पति-पत्नि के बीच वाद-विवाद, झगड़े जैसी घटनाएँ होने लगे तो जन्म कुण्डली के बारहवें भाव में पड़े ग्रह की शान्ति करावें।
18 दाम्पत्य की दृष्टि से पत्नि को अपना सारा बनाव श्रृगांर (मेकअप) आदि सांयकाल या उसके पश्चात करना चाहिए जिससे गुरू , मंगल और सूर्य अनुकूल होता हैं। दीन में स्त्री जितना मेकअप करेगी पति से उसकी दूरी बढ़ेगी।
19 पति-पत्नि के बीच किसी मजबूरी के चलते स्वैच्छिक दूरी बढ़े तो पति-पत्नि दोनों को गहरे पीले रंग का पुखराज तर्जनी अंगुली में धारण करना चाहिए।
20 यह बात ध्यान रखें कि वैवाहिक जीवन में मंगल अहंकार देता हैं स्वाभिमान नहीं। दाम्पत्य जीवन की सफलता हेतु दोनंों की ही आवश्यकता नहीं होती हैं। पाप ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य को बिगाड़ देता हैं। ऐसी स्थिती में चन्द्रमा के साथ जिस पाप ग्रह का प्रभाव हो उस ग्रह की शांति कराने से दाम्पत्य जीवन सुखमय होता हैं। शुक्ल पक्ष मेें पति-पत्नी चाँदनी रात में चन्द्र दर्शन कर, चन्द्रमा की किरणों को अपने शरीर से अवश्य स्पर्श करवावें।
21 बाग - बगीचा, नदी , समुद्र, खेत, धार्मिक स्थल एवं पर्यटन स्थलों आदि पर पति - पत्नी साथ जायें तो श्रेष्ट होगा। इससे गुरू व शुक्र प्रसन्न होगें, इसके विपरीत कब्रिस्तान , कोर्ट - कचहरी , पुलिस थाना , शराब की दुकान , शमशान व सुना जंगल आदि स्थानों पर पति-पत्नी भूलकर भी साथ न जायें।
22 मंगल के कोप के कारण बार - बार संतान गर्भ में नष्ट होने से पति-पत्नी के बीच तनाव , रोग एवं परेशानियां उत्पन्न होती हैं ऐसी स्थिति में पति - पत्नी को महारूद्र या अतिरूद्र का पाठ करना चाहिए।
23 मंगल की अशुभ दशा , अन्तर्दशा में पति - पत्नी के बीच कलह , वाद - विवाद व अलगाव सम्भावित हैं। ऐसी स्थिती में गणपति स्त्रोत , देवी कवच , लक्ष्मी स्त्रोत , कार्तिकेय स्त्रोत एवं कुमार कार्तिकेय की नित्य पूजा अर्चना एवं पाठ करना चाहिए।
24 जिन युवक-युवतियों का विवाह मंगल दोष के कारण नहीं हो रहा हैं, उन्हें प्रतीक स्वरूप विवाह करना चाहिए। जिनमें कन्या का प्रतीक विवाह भगवान विष्णु से या सालिग्राम के पत्थर या मूर्ति से कराया जाता हैं। इसी प्रकार पुरूष का प्रतीक विवाह बैर की झाडि़यों से कराया जाता हैं।
25 विवाह के इच्छुक मांगलिक युवक-युवतियों को तांबंे का सिक्का पाकेट या पर्स में रखना चाहिए। तांबें की अंगुठी अनामिका अंगुली में धारण करे, तांबे का छल्ला साथ रखें, रात्रि में तांबे के पात्र में जल भरकर रखें व प्रातः काल उसे पीयें।
26 प्रतिदिन तुलसी को जल चढ़ाने और तुलसी पत्र का सेवन करने से मंगल के अनिष्ठ शांत होते हैं।
27 अपना चरित्र हमेशा सही रखें । झूठ नहीं बोले । किसी को सताए नहीं । झूठी गवाही कभी भी ना देवे । दक्षिण दिशा वाले द्वार में न रहें । किसी से ईष्र्या, द्वेश भाव न रखे । यथा शक्ति दान करें ।
28 मंगलवार के दिन सौ गा्रम बादाम दक्षिणमुखी हनुमानजी के यहां ले जावे । उनमें से आधे बादाम मंदिर में रख देवे और आधे बादाम घर लाकर पूजा स्थल पर रखें । बादाम खुले में ही रखे । यह जब तक रखे जब तक की आपकी मंगल की महादशा चलती हैं ।
29 मूंगा या रूद्राक्ष की माला हमेशा अपने गले में धारण करें ।
30 आँखो में सुरमा लगावें । जमीन पर सोयें । गायत्री मंत्र का जाप संध्याकाल में करें ।
31 नित्य सुबह पिता अथवा बड़े भाई के चरण छुकर आशीर्वाद लेवें ।
32 मंगल की शांति हेतु मूंगा रत्न धारण करना चाहिए इसके लिए चांदी की अंगुठी में मूंगा जड़वाकर दायें हाथ की अनामिका में धारण करना चाहिए। मंूगे का वजन 6 रत्ती से अधिक होना चाहिए। धारण करने से पूर्व मूंगे  को गंगाजल, गौमूत्र अथवा गुलाब जल से स्नान करवाकर शुद्ध करें तत्पश्चात विधि अनुसार धारण करें।
33 जो जातक मूंगा धारण नहीं कर सकते उन्हें तीनमुखी रूद्राक्ष धारण कराना चाहिए । तीन मुखी रूद्राक्ष को लाल धागे में गुथकर धूपित करके, मंगलवाल के दिन गले या दाहिने हाथ में धारण करें । इसके प्रभाव से उन्हें मंगल शांति में सफलता मिलती हैं ।
34 क्रुर व उग्र होते हुए भी सौम्य ग्रहों की युति से मंगल विशेष सौम्य फल प्रदान करता हैं । चन्द्र व मंगल की युति आकस्मिक धनप्राप्ति, शनि मंगल की युति डुप्लीकेट सामान बनाने व नकल करने में माहिर बनाता हैं, ऐसा व्यक्ति कार्टूनिस्ट, पोट्रेट आर्टिस्ट व मुखौटे बनाने में निपुण हो सकता हैं । शुक्र व मंगल की युति फोटोग्राफी, सिनेमा तथा चित्रकारी आदि की योग्यता भी देता हैं । बुध के साथ युति होने पर जासूस का वैज्ञानिक और मांगलिक प्रभाव भी नष्ट करता हैं, किन्तु जिन घरों पर वह दृष्टि डालता हें वहां अवश्य ही हानि करने वाला होता हैं । कुण्डली में सातवां घर मंगल का ही माना जाता हैं क्योकिं यह मंगल की उच्च राशि हैं । अतः सातवां घर मंगल की स्वराशि का घर कहलाता हैं ।
35 पुत्रहीनता तथा ऋणग्रस्तता दूषित मंगल की ही देन होती हैं । स्त्रियों में कामवासना का विशेष विचार भी मंगल से किया जाता हैं । 
----लगन दूसरे भाव चतुर्थ भाव सप्तम भाव और बारहवें भाव के मंगल के लिये वैदिक उपाय बताये गये है,सबसे पहला उपाय तो मंगली जातक के साथ मंगली जातक की ही शादी करनी चाहिये। लेकिन एक जातक मंगली और उपरोक्त कारण अगर मिलते है तो दूसरे मे देखना चाहिये कि मंगल को शनि के द्वारा कहीं द्रिष्टि तो नही दी गयी है,कारण शनि ठंडा ग्रह है और जातक के मंगल को शांत रखने के लिये काफ़ी हद तक अपना कार्य करता है,दूसरे पति की कुंडली में मंगल असरकारक है और पत्नी की कुंडली में मंगल असरकारक नहीं है तो शादी नही करनी चाहिये। 
----वैसे मंगली पति और पत्नी को शादी के बाद लालवस्त्र पहिन कर तांबे के लोटे में चावल भरने के बाद लोटे पर सफ़ेद चन्दन को पोत कर एक लाल फ़ूल और एक रुपया लोटे पर रखकर पास के किसी हनुमान मन्दिर में रख कर आना चाहिये। 
---चान्दी की चौकोर डिब्बी में शहद भरकर रखने से भी मंगल का असर कम हो जाता है,
---घर में आने वाले महिमानों को मिठाई खिलाने से भी मंगल का असर कम रहता है,मंगल शनि और चन्द्र को मिलाकर दान करने से भी फ़ायदा मिलता है,
---मंगल से मीठी शनि से चाय और चन्द्र से दूध से बनी पिलानी चाहिये।

मंगल के प्रभाव से होने वाले रोगादि रक्त-सम्बन्धी रोग, पित्त विकार, मज्जा विकार, नेत्र विकार, जलन, तृष्णा, मिर्गी व उन्माद आदि मानसिक रोग, चर्म रोग, अस्थिभ्रंश, आॅपरेशन, दुर्घटना, रक्तस्त्राव व घाव, पशुभय, भूत-पिशाच के आवेश से होने वाली पीड़ाएं आदि विशेष हैं । निर्बल होने से यह जीवन शक्ति उत्साह व उमंग का नाश करता हैं 






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जानिए मंगल दोष से होने वाली परेशानिया -----

---आजकल ये भ्रम हो गया हैं  की मंगली होने का मतलब मंगल दोष होता है
---मंगल दोष 28 वे वर्ष में अपने आप समाप्त हो जाता है और बिना कुंडली मिलाये शादी करा देनी चाहिए ये गलत धारणा है
---मंगल दोष वाले माता पिता की संतान का 5 वर्ष की आयु तक बेहद खास  ध्यान रखने की जरूरत होती
है क्यूंकि उसका immune सिस्टम काफी कमजोर होगा इस बात की बहुत संभावना होती है...
---मंगल दोष वाले लोग विधुर /विधवा हो जायेंगे ये एक मिथ्या धारणा है...
---मंगली होने का ये मतलब नहीं है की मंगल दोष होगा
---मंगल दोष के कारण लोगो के प्रेम सम्बन्ध टूट जाते है और ये दुःख दे के टूटते है,पिता व भाई की ख़ुशी में कमी होती है
---यदि बृहस्पति मजबूत हुआ तो मंगल दोष वाले love मैरिज के बाद भी सम्बन्ध टूट जाने वाली situation आ सकती है
---मंगल दोष जब बहुत जादा प्रभावित करता है तो लोग शादी के लिए आपको approach करेंगे लेकिन जैसे ही आप कही बात करोगे तो वो बात टूट जाएगी आपको कोई response नहीं देगा लोग आपके फ़ोन का उत्तर तक
नहीं देंगे ,रिश्ते नहीं आएंगे आएंगे भी तो टूट जायेंगे
----यदि रिश्ते आये भी तो आपकी तरफ से कोशिश करने से बात नहीं बनेगी,किसी ख़राब पार्टनर के साथ जीवन जीने से अच्छा है की अकेले ही रहा  जाये
---ज्योतिष के according 70% लोग मंगल दोष से प्रभावित या पीड़ित मिलेंगे,बिना सोचे समझे या जाने ज्योतिष के फंडे न लगाये सिर्फ लैपटॉप ले के सॉफ्टवेयर से कुंडली बना लेने से राशी भाव और गृह देख लेने मात्र से कोई ज्योतिषी नहीं हो जाता उसके लिये गहरे ज्ञान की आवश्यकता भी होती है...
---पति पत्नी में मंगल दोष हो तो वो एक दूसरे की इज्जत नहीं करेंगे...
----मंगल की छाया या आंशिक मंगल कुछ लोग बोलते है ऐसा नहीं होता...
---मंगल दोष से प्रभावित लोगो को लम्बे समय तक (या सही शब्दों में जीवन पर्यंत उपाय )
करने चाहिए ...खून में heamoglobin कम होने पे हरी मिर्च खाए ये आपकी मदद करती है
---कुंडली में सिर्फ मंगल की विशेष positions (1,2,4,7,8) पे होने के कारण ही मंगल दोष नहीं लगता
---मंगली होना और मंगल दोष होना दो अलग अलग चीज़े है...
---यदि किसी की कुंडली में मंगल दोष है तो प्रेम संबंधो में सावधान रहने की जरूरत है
अधिकतर ऐसे सम्बन्ध चरित्र पे दाग लग के टूट जाते है...misconception जो मंगली/मंगल दोष से प्रभावित होते है उनका विवाह नहीं होता..मंगल दोष वाले माता पिता की संतान को कष्ट होता है (इससे रिकवर किया जा सकता है )..मंगल शारीरिक शक्ति को denote करता है यदि कमजोर होगा तो शारीरिक उर्जा कम होगी,ऐसे लोगो की संतान बीमार बहुत जल्दी जल्दी होगी ,यदि आपको मंगल दोष हो तो ऐसे  माता पिता अपने घर का माहौल शांत रखे

मंगल दोष परिहार के कुछ प्रभावी एवं लाभकारी उपाय---

मंगल दोष परिहार के कुछ प्रभावी एवं लाभकारी उपाय----

मंगल दोष की वजह से विवाह में देरी हो तो ये उपाय जरूर करने चाहिए। माना जाता है कि इन उपायों को करने से  विवाह में आ रही बाधाएं जल्द दूर होती हैं और मनचाही कन्या से विवाह होता है।

जिन जातकों की जन्म कुंडली के 1,4,7 और 12 वें भाव में मंगल होता है, उन्हें मांगलिक दोष होता है। इस दोष के कारण जातक को कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है जैसे उनके भूमि से संबंधित कार्यो में बाधा आती है। विवाह में विलंब होता है। ऋण से मुक्ति नहीं मिलती, वास्तुदोष उत्पन्न हो सकता है आदि- आदि। इन सब दोषों के शमन के लिए अवन्तिका यानि उज्जैन में मंगल दोष निवारण के लिए विशेष पूजा कराने का विधान है। मंगल ग्रह की जन्म स्थली उज्जैन में पूजा करने से दोष समाप्त हो जाता है।

मंगल की शांति के लिए अवन्तिका में भात पूजा कराने का विधान है।  मंगल की क्रूर दृष्टि यहां पूजा करने से कृपा दृष्टि में बदल जाती है। यह पूजा उज्जैन में स्थित श्री अंगारेश्वर महादेव मंदिर में पुरोहितों द्वारा संपन्न कराई जाती है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव का दही भात का लेप करने से अग्नि शांत(मांगलिक दोष निवारण) होती है। इस प्रक्रिया में भगवान गणपति पूजन, माताजी पूजन, संकल्प, भगवान शिव का अभिषेक, पंचामृत पूजा, भात का पूजन(पंचामृत में उबले हुए भात मिलाकर) शिवलिंग पर लेप किया जाता है। 










उज्जैन के 84 मंदिरों में से 43वें मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित अंगारेश्वर महादेव मंदिर की प्राचीनता के बारे में यहाँ के पुजारी पं मनीष उपाध्याय बताते हैं कि अंगारक को तपस्या करने का निर्देश भगवान शिव ने दिया था। साथ ही यह भी बताया कि अवन्तिका के महाकाल वन मे खगरता के संगम पर गंगेश्वर के उत्तर में ब्रह्माजी द्वारा स्थापित शिवलिंग है। जिसकी पूजा देवता गंधर्व करते हैं । अंगारक ने यहीं सोलह हजार वर्ष तक तप किया। 

उपाध्याय के अनुसार पहले क्षिप्रा का पाट चौड़ा था। इसलिए इस शिवलिंग का पूजन नहीं हो पाता था। वर्ष  1973 की बाढ़ में मंदिर ध्वस्त हो गया था। इसका पुनर्निमाण सन 1980 में हुआ। स्कंध पुराण , अग्नि पुराण,  के रूप में गंगारक का ही उल्लेख मिलता है तथा गणेश पुराण मे अंगारक स्तोत्र यहां मंगल दोष निवारणार्थ भात पूजा और अन्य पूजा संपन्न होती हैं। शांत प्रिय और एकाग्र मन से अंगारेश्वर महादेव की पूजा करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हेैं। मंगल शांति होने से लाभ मिलता है। 

इस पूजा के प्रभाव से भूमि के अटके काम, ऋण मुक्ति, वास्तुदोष, संतान, विवाह में मांगलिक दोष से व्यवधान, व्यापार में रूकावटें आदि का शमन हो जाता हैं ।

----मंगल दोष शांति के विशेष दान :---- 

शास्त्रानुसार लाल वस्त्र धारण  करने से व किसी ब्रह्मण अथवा क्षत्रिय को मंगल की निम्न वास्तु का दान करने से जिनमे -  गेहू, गुड, माचिस, तम्बा, स्वर्ण, गौ, मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है | लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल जनित अमंगल दूर होता है |
----- तुलसी के पौधे को (रविवार को छोड़कर) हर शाम प्रणाम कर उसके पास घी का दीपक जलाएं। तुलसी के मनकों की माला पहनें और भगवान कृष्ण का श्रद्धा से पूजन कीजिए। कृष्ण की एक तस्वीर तुलसी के पौधे के पास भी स्थापित कीजिए।
----अगर कुंडली में मंगल के कारण विवाह में विलंब हो रहा है तो जेब या पर्स में चांदी का चौकोर टुकड़ा सदा अपने साथ रखें। यह मंगल दोष के प्रभाव को कम कर आपका कार्य सिद्ध कर देगा।
-----जिन लोगों की कुंडली मांगलिक होती है उन्हें प्रति मंगलवार मंगलदेव के निमित्त विशेष पूजन करना चाहिए। मंगलदेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं जैसे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए। 
----जिन लोगों की कुंडली में मंगलदोष है उनके द्वारा प्रतिदिन या प्रति मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें। इस प्रकार भी मंगल दोष की शांति हो सकती है।
------शुक्ल पक्ष के मंगलवार को चांदी का एक टुकड़ा लेकर उसे जमीन में गड्ढा खोदकर रख दें। अब उस पर पानी डालें और थोड़ी मिट्टी भी डाल दें। तत्पश्चात इस पर तुलसी का पौधा लगा दें। इस पौधे का ध्यान रखें और नियमित जल आदि डालें। यह उपाय भी मंगल के कुप्रभाव को दूर कर विवाह में बाधाओं का निवारण करता है।
----शास्त्रों के अनुसार मंगल दोष का निवारण अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) में ही हो सकता है। अन्य किसी स्थान पर नहीं। उज्जैन ही मंगल देव का जन्म स्थान है और मंगल के सभी दोषों का निवारण यहीं किए जाने की मान्यता है। मंगलदेव के निमित्त भात पूजा की जाती है। जिससे मंगल दोषों की शांति होती है।
---अगर किसी युवती के विवाह में मंगल की वजह से बाधा आ रही है तो शुक्ल पक्ष के मंगलवार को भगवान राम-सीता व हनुमानजी के चित्र की स्थापना करें और दीपक जलाकर सुंदरकांड का पाठ करें। 
---बंदरों व कुत्तों को गुड व आटे से बनी मीठी रोटी खिलाएं |
----- मंगल चन्द्रिका स्तोत्र का पाठ करना भी लाभ देता है |
----- माँ मंगला गौरी की आराधना से भी मंगल दोष दूर होता है |
----- कार्तिकेय जी की पूजा से भी मंगल दोष के दुशप्रभाव में लाभ मिलता है |
------ मंगलवार को बताशे व गुड की रेवड़ियाँ बहते जल में प्रवाहित करें |
----- आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिला दें |
----- मंगली कन्यायें गौरी पूजन तथा श्रीमद्भागवत के 18 वें अध्याय के नवें श्लोक का जप अवश्य करें |
---- मांगलिक वर अथवा कन्या को अपनी विवाह बाधा को दूर करने के लिए मंगल यंत्र की नियमित पूजा अर्चना करनी चाहिए।
---- मंगल दोष द्वारा यदि कन्या के विवाह में विलम्ब होता हो तो कन्या को शयनकाल में सर के नीचे हल्दी की गाठ रखकर सोना चाहिए और नियमित सोलह गुरूवार पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाना चाहिए |
----- मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से व हनुमान जी को सिन्दूर एवं चमेली का तेल अर्पित करने से मंगल दोष शांत होता है |
----- महामृत्युजय मंत्र का जप हर प्रकार की बाधा का नाश करने वाला होता है, महामृत्युजय मंत्र का जप करा कर मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक व दांपत्य जीवन में मंगल का कुप्रभाव दूर होता है |
----- यदि कन्या मांगलिक है तो मांगलिक दोष को प्रभावहीन करने के लिए विवाह से ठीक पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण  प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करे |
----- यदि वर मांगलिक हो तो विवाह से ठीक पूर्व वर का विवाह तुलसी के पौधे के साथ या जल भरे घट (घड़ा) अर्थात कुम्भ से करवाएं। 
----यदि मंगली दंपत्ति विवाहोपरांत लालवस्त्र धारण कर तांबे के पात्र में चावल भरकर एक रक्त पुष्प एवं एक रुपया पात्र पर रखकर पास के किसी भी हनुमान मन्दिर में रख आये तो मंगल के अधिपति देवता श्री हनुमान जी की कृपा से उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखी बना रहता है |
---मांगलिक-दोष दूर करते हैं मंगल के यह  21 नाम। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें---- 
1. ऊँ मंगलाय नम: 
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम: 
4. ऊँ धनदाय नम: 
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम: 
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम: 
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम: 
12. ऊँ कुजाय नम: 
13. ऊँ रक्ताय नम: 
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 
15. ऊँ भूमिदाय नम: 
16. ऊँ अंगारकाय नम: 
17. ऊँ यमाय नम: 
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम: 
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम: 
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम: 
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम: 

विशेष:--- किसी अनुभवी और विद्वान ज्योतिषी से चर्चा करके ही श्री अंगारेश्वर महादेव पर मंगलदोष निवारण के उपाय भट पूजन आदि करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।
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कैसे पहुंचे उज्जैन-----

इंदौर (55 किलोमीटर) निकटतम हवाई अड्डा है. यह भोपाल, मुंबई, दिल्ली और ग्वालियर से जुड़ा है.

इंदौर (55 किलोमीटर)में बस स्टोप है. यह भोपाल, मुंबई, दिल्ली और ग्वालियर से जुड़ा है.

इंदौर (55 किलोमीटर)में रेलवे स्टेशन है. यह भोपाल, मुंबई, दिल्ली और ग्वालियर से जुड़ा है.
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क्या करें अगर कुंडली में राहु-मंगल हों साथ-साथ?

ज्योतिष में मंगल और राहु मिल कर अंगारक योग बनाते हैं। लाल किताब में इस योग को पागल हाथी का नाम दिया गया है। अगर यह योग किसी की कुंडली में होता है तो वो व्यक्ति अपनी मेहनत से नाम और पैसा कमाता है। ऐसे लोगों के जीवन में कई उतार चढ़ाव आते हैं।

यह योग अच्छा और बुरा दोनों तरह का फल देने वाला है। ज्योतिष में इस योग को अशुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुंडली में यह योग होने पर इसकी शांति करवाना चहिए नहीं तो लंबे समय तक परेशानियां बनी रहती हैं। उज्जैन में अंगारेश्वर महादेव मन्दिर में मंगल-राहु अंगारक योग की शांति होती है।
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क्या प्रभाव होता है कुंडली के बारह घरों में मंगल-राहु अंगारक योग का?

1- कुंडली के पहले घर में मंगल-राहु अंगारक योग होने से पेट के रोग और शरीर पर चोट का निशान रहता है।

ये उपाय करें- रेवडिय़ां, बताशे पानी में बहाएं।

2- कुंडली के दूसरे भाव में अंगारक योग होने से धन संबंधित उतार चढ़ाव आते हैं। ऐसे लोग धन के मामलों में जोखिम लेने से नहीं घबराते हैं।

ये उपाय करें- चांदी की अंगूठी उल्टे हाथ की लिटील फिंगर में पहनें।

3- जिन लोगों की कुंडली के तीसरे भाव में ये योग होता उनको भाइयों और मित्रों से सहयोग मिलता है और वो लोग मेहनत से पैसा, मान सम्मान कमाते हैं।

ये उपाय करें- घर में हाथी दांत रखें।

4- कुंडली के चौथे भाव में ये योग होने से माता के सुख में कमी आती है और भूमि संबंधित विवाद चलते रहते हैं।

ये उपाय करें- सोना, चांदी और तांबा तीनों को मिलाकर अंगूठी पहनें।

5- कुंडली के पांचवें भाव में अंगारक योग योग जुए, सट्टे, लॉटरी और शेयर बाजार में लाभ दिलाता है।

ये उपाय करें- रात को सिरहाने पानी का बर्तन भरकर रखें और सुबह उठते ही पेड़-पौधों में डालें।

6- जिन लोगों की कुंडली के  छठे घर में मंगल-राहु एक साथ होते हैं ऐसे लोग ऋण लेकर उन्नति करते हैं। अच्छे वकील और चिकित्सक भी इसी योग के कारण बनते हैं।

ये उपाय करें- कन्याओं को दूध और चांदी का दान दें।

7- कुंडली के सातवें भाव में अंगारक योग साझेदारी के काम में फायदा दिलाता है।

ये उपाय करें- चांदी की ठोस गोली अपने पास रखें।

 8- जिन लोगों की कुंडली के  आठवें घर में अंगारक योग बनता है ऐसे लोगों को वसीयत में सम्पत्ति मिलती है। ऐसे लोगों को ऐक्सीडेंट का खतरा होता है।

ये उपाय करें- एक तरफ सिकी हुई मीठी रोटियां कुत्तों को डालें।

9- कुंडली के नवें घर में ये योग बनता है तो ऐसे लोग कर्मप्रधान होते है ऐसे लोगों की किस्मत ज्यादातर साथ नहीं देती। ये लोग कुछ रूढ़ीवादी होते हैं।

ये उपाय करें- मंगलवार को हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं।

10- दसवें भाव में अंगारक योग जिन लोगों की कुंडली में होता है वो लोग रंक से राजा बन जाते हैं।

ये उपाय करें- मूंगा रत्न धारण करें।

11- कुंडली के लाभ भाव यानि ग्यारहवें भाव में अंगारक योग होने से प्रॉपर्टी से लाभ मिलता है।

ये उपाय करें- मिट्टी के बर्तन में सिन्दूर रख कर, उसे घर में रखें।

12- बारहवें भाव में अंगारक योग होता है उन लोगों का पैसा विदेश में जमा होता है। ऐसे लोग रिश्वत में पकड़ा जाते हैं कभी कभी जेल यात्रा के योग भी बनते हैं।

ये उपाय करें- रोज सुबह थोड़ा शहद खाएं।
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मंगल से प्रभावित होते हैं मंगली----

 ज्योतिष के अनुसार मंगली लोगों पर मंगल ग्रह का विशेष प्रभाव होता है। यदि मंगल शुभ हो तो वह मंगली लोगों को मालामाल बना देता है। मंगली व्यक्ति अपने जीवन साथी से प्रेम-प्रसंग के संबंध में कुछ विशेष इच्छाएं रखते हैं, जिन्हें कोई मंगली जीवन साथी ही पूरा कर सकता है। इसी वजह से मंगली लोगों का विवाह किसी मंगली से ही किया जाता है।

कौन होते हैं मंगली?

कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं। इन्हीं दोषों में से एक है मंगल दोष। यह दोष जिस व्यक्ति की कुंडली में होता है वह मंगली कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के 1, 4, 7, 8, 12 वें स्थान या भाव में मंगल स्थित हो तो वह व्यक्ति मंगली होता है।
मंगल के प्रभाव के कारण ऐसे लोग क्रोधी स्वभाव के होते हैं। ज्योतिष के अनुसार मंगली व्यक्ति की शादी मंगली से ही होना चाहिए। यदि मंगल अशुभ प्रभाव देने वाला है तो इसके दुष्प्रभाव से कई क्षेत्रों में हानि प्राप्त होती है। भूमि से संबंधित कार्य करने वालों को मंगल ग्रह की विशेष कृपा की आवश्यकता है।
 मंगल देव की कृपा के बिना कोई व्यक्ति भी भूमि संबंधी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। मंगल से प्रभावित व्यक्ति अपनी धुन का पक्का होता है और किसी भी कार्य को बहुत अच्छे से पूर्ण करता है।
हमारे शरीर में सभी ग्रहों का अलग-अलग निवास स्थान बताया गया है। ज्योतिष के अनुसार मंगल ग्रह हमारे रक्त में निवास करता है।

मंगली लोगों की खास बातें----
मंगली होने का विशेष गुण यह होता है कि मंगली कुंडली वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाता है। कठिन से कठिन कार्य वह समय से पूर्व  ही कर लेते हैं। नेतृत्व की क्षमता उनमें जन्मजात होती है।
ये लोग जल्दी किसी से घुलते-मिलते नहीं परंतु जब मिलते हैं तो पूर्णत: संबंध को निभाते हैं। अति महत्वाकांक्षी होने से इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता है। परंतु यह बहुत दयालु, क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते हैं। गलत के आगे झुकना इनको पसंद नहीं होता और खुद भी गलती नहीं करते।
ये लोग उच्च पद, व्यवसायी, अभिभाषक, तांत्रिक, राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, इंजीनियर सभी क्षेत्रों में यह विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं। विपरित लिंग के लिए यह विशेष संवेदनशील रहते हैं, तथा उनसे कुछ विशेष आशा रखते हैं। इसी कारण मंगली कुंडली वालों का विवाह मंगली से ही किया जाता है।

ग्रहों का सेनापति है मंगल----
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रह बताए गए हैं जो कुंडली में अलग-अलग स्थितियों के अनुसार हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। हमें जो भी सुख-दुख, खुशियां और सफलताएं या असफलताएं प्राप्त होती हैं, वह सभी ग्रहों की स्थिति के अनुसार मिलती है। इन नौ ग्रहों का सेनापति है मंगल ग्रह। मंगल ग्रह से ही संबंधित होते है मंगल दोष। मंगल दोष ही व्यक्ति को मंगली बनाता है।

पाप ग्रह है मंगल---
मंगल ग्रह को पाप ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में मंगल को अनुशासन प्रिय, घोर स्वाभिमानी, अत्यधिक कठोर माना गया है। सामान्यत: कठोरता दुख देने वाली ही होती है। मंगल की कठोरता के कारण ही इसे पाप ग्रह माना जाता है। मंगलदेव भूमि पुत्र हैं और यह परम मातृ भक्त हैं। इसी वजह से माता का सम्मान करने वाले सभी पुत्रों को विशेष फल प्रदान करते हैं। मंगल बुरे कार्य करने वाले लोगों को बहुत बुरे फल प्रदान करता है।

मंगल के प्रभाव----
मंगल से प्रभावित कुंडली को दोषपूर्ण माना जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में मंगल अशुभ फल देने वाला होता है उसका जीवन परेशानियों में व्यतीत होता है। अशुभ मंगल के प्रभाव की वजह से व्यक्ति को रक्त संबंधी बीमारियां होती हैं। साथ ही, मंगल के कारण संतान से दुख मिलता है, वैवाहिक जीवन परेशानियों भरा होता है, साहस नहीं होता, हमेशा तनाव बना रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल ज्यादा अशुभ प्रभाव देने वाला है तो वह बहुत कठिनाई से जीवन गुजरता है। मंगल उत्तेजित स्वभाव देता है, वह व्यक्ति हर कार्य उत्तेजना में करता है और अधिकांश समय असफलता ही प्राप्त करता है।

मंगल का ज्योतिष में महत्व:------ ज्योतिष में मंगल मुकदमा ऋण, झगड़ा, पेट की बीमारी, क्रोध, भूमि, भवन, मकान और माता का कारण होता है। मंगल देश प्रेम, साहस, सहिष्णुता, धैर्य, कठिन, परिस्थितियों एवं समस्याओं को हल करने की योग्यता तथा खतरों से सामना करने की ताकत देता है।

मंगल की शांति के उपाय:----- भगवान शिव की स्तुति करें। मूंगे को धारण करें। तांबा, सोना, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल फूल, केशर, कस्तुरी, लाल बैल, मसूर की दाल, भूमि आदि का दान।
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विवाह के दौरान इसे दोष के रूप में क्यों माना जाता है?

मंगल ग्रह 1,4,7,8 और 12 वें घर में होने से घर को प्रभावित करता है, इसे मंगल दोष कहा जाता है। मंगल ग्रह एक ऐसा ग्रह है जो आग, बिजली, रसायन, हथियार, आक्रामकता, उच्च ऊर्जा, रक्त, लड़ाई , दुर्घटना आदि का प्रतिनिधि माना जाता है। चलो देखते हैं क्या इन घरों में स्थित मंगल हो रहे प्रभावो के नतीजों का प्रतिनिधि है? घर में जो भी यह स्थित है या इसकी दृष्टि से उस घर पर मंगल के प्रभाव को जीवन के पहलुओं में अनुभव करने के लिए प्रतिनिधित्व करती है|
यदि मंगल 1 घर में है तब वह 1, 4, 7 और 8 वें घर को प्रभावित करेगा। 1 घर व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति बहुत संयमहीन होता है। 4 घर सदन का प्रतिनिधित्व करता है, व्यक्तियों की वाहन, घर से जुड़ी समस्याओं या जैसे आग, रसायन के कारण दुर्घटना, बिजली आदि की संभावना होती है| और 7 घर वैवाहिक जीवन, और साझेदारी में पति व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए अशांत विवाहित जीवन की संभावना होती है, पति या पत्नी बहुत गर्म स्वभाव प्रकृति के हो तो साझेदारी में नुकसान हो सकता है| 8 घर मौत का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति के लिए अचानक घातक दुर्घटना की संभावना होती है| बेशक ये बहुत व्यापक दिशानिर्देश हैं| कुंडली के समग्र गुणवत्ता, ग्रहों की शक्ति, आदि ग्रहों के पहलुओं की तरह कई अन्य कोणों से अध्ययन करने की आवश्यकता होती है।
यदि मंगल 4 घर में है तब यह 4 घर में 7, 10 और 11 घर को प्रभावित करेगा | हमने 4 और 7 घर पर प्रभाव देखा है। 10 वाँ घर कैरियर, पिता, नींद आदि का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए लगातार परिवर्तन कैरियर में गड़बड़ी विकार अनिंद्रा या यहाँ तक कि पिता की जल्दी मौत आदि की संभावना को दर्शाता है। 11 वाँ घर जीवन में मौद्रिक लाभ अर्जित करता है, इसलिए दुर्घटनाओं के कारण नुकसान, चोरी आदि की संभावना होती हैं।
यदि मंगल 7 घर में है तब यह 10 वे घर को प्रभावित करता है| 1 और 2 घर के अलावा 7 और 2 घर में होता है जो व्यक्ति को धन के बारे में विचार देता है। यह व्यक्ति के परिवार को संकेत देता है और यह भी 8 घर के साथ 7 घर में विवाहित जीवन में मृत्यु या साझेदारी में व्यापार के संकेत देता है इसलिए इस घर पर मंगल दृष्टि की वजह से परिवार के सदस्यों के बीच संयमहीन और आक्रामक व्यवहार जैसे मुद्दों को बना सकता हैं। जिससे धन की हानि की संभावना भी होती है।
8 सभा यह 11, 2 और 3 घर को प्रभावित करता है। 3 घर एक व्यक्ति की मौखिक संचार कौशल ,व्यक्ति की आवाज, व्यक्ति की उपलब्धियों, भाइयों और बहनों का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए मंगल से भाई बहन के बीच तनाव पैदा हो सकता है, व्यक्ति बोलने में बहुत अशिष्ट और अभिमानी हो सकता है, दूसरों से अक्सर चोट और शायद सफलता से अधिक विफलताओं से पीडित हो सकता है।
12 वें घर में मंगल ग्रह 3, 6 और 7 घर को प्रभावित करता है। 12 वाँ घर व्यक्ति के खर्च प्रकृति को संकेत करता है । इसलिए व्यक्ति से अधिक खर्च प्रकृति का हो सकता है। 6 घर रोग, चोरी नौकरों के कारण को, मातृ चाचा आदि संकेत करता है। व्यक्ति को अम्लता के कारण बीमारियों, हाइपरटेंशन, रक्त आदि रोग होने की संभावना होती है।
इस प्रकार आप पर्यवेक्षक हैं कि अगर मंगल से इन घरों में परेशानी है ,जो विवाहित जीवन को प्रभावित करते है, इसलिए कुंडली में मंगल दोष अनुपयुक्त माना जाता है।
किन स्थितियों में जीवन साथी की कुडंली में मंगल दोष होने पर मिलान किया जाता हैं?

यदि शनि 1, 4, 7, 8, 12, घर में हो।
यदि शनि 7 वें घर के साथ 3 या 10वें दृष्टि को प्रभावित कर रहा हो। यानि यदि शनि 5 वें या 10वें घर में हैं।
यदि शक्तिशाली बृहस्पति कर्क, धनु ,मीन या वरगोतम, उच्चा नवमांश, सप्तमांश आदि पहले घर में हो।
यदि 7 वें घर में बृहस्पति 5 वें या 9 वें से प्रभावित हैं 3 या 11वें घर में रखा गया हैं।
यदि राहु या केतु 1 या 7वें घर में स्थित हो ।
मंगल के 21 वीं सदी में महत्व क्या हैं?

मंगल ग्रह एक लड़ाकू ग्रह है। जो कठिन परिस्थितियों से बाहर आने में मदद करता हैं, तनाव से निपटने में मदद देता है।
यह आक्रामकता से जरूरी चुनौतियों को लेना सिखाता हैं।
यह व्यक्ति को उघोग प्रकृति देता हैं ।
मंगल ग्रह उच्च अनुशासन, अच्छा प्रशासन और कर्म निर्णय लेना सिखाता हैं, ये सब किसी भी सफल नेता के लिए आवश्यक गुण है।
मंगल ग्रह एक सर्जन ,जनरल, एयर मार्शल, एडमिरल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , व्यवसायी आदि के लिए एक उपहार हैं।

आइये जाने श्री अंगारेश्वर महादेव(मंगलदोष दूर करने वाले) की उत्पत्ति की प्रचलित विभिन्न कथाएं-

आइये जाने श्री अंगारेश्वर महादेव(मंगलदोष दूर करने वाले) की उत्पत्ति की प्रचलित विभिन्न कथाएं--- 

श्री अंगारेश्वर महादेव की कथा---

देवाधिदेव भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा की हे पर्वत की कन्या  उज्जैन में तिरालीसवाँ ज्योतिर्लिंग अंगारेश्वर का हैं जिनके दर्शन मात्र से सर्व सम्पदा प्राप्त होती हैं...

पूर्व कल में लाल शरीर की शोभवाला और टेड़े शरीर वाला क्रोध से युक्त यह बालक मेरे द्वारा ही उत्पन्न हुआ...मेने उसे पृथ्वी पर रख दिया इसलिए उसका नाम भूमि पुत्र हुआ.पैदा होते ही स्थूल शरीर वाला वह  बालक भय देने लगा..उसके कोप से पृथ्वी कम्पित होने लगी..मनुष्य और देवतादि सब दुखी हो गए ..समुद्रों में तूफान(बाढ़) आने लगी..पर्वत हिलने लगे..उसी के प्रभाव स्वरूप देवता मनुष्य आदि परेशान होने लगे..

वाल खिल्यादिक ऋषि देवता इंद्रा सभी देवगुरु वृहस्पति के पास गए और उनसे चर्चा कर उन्हें अपने साथ लेकर ब्रह्मलोक गए..और पितामह ब्रह्मा जी को सारा वृतांत सुनाया  की किस प्रकार भगवान शंकर के शरीर से बालक का जन्म हुआ और उत्पन्न होने के कुछ ही समय में उसने तीनो लोकों का भ्रमण कर डाला..अनेकों का भक्षण कर लिया और सभी को परेशान कर दिया..

सभी की बातें सुनकर प्रजापिता ब्रह्मा जी ने मुझसे कैलाश पर्वत पर आकर मिलाने का निर्णय किया..
मेरे पास आकर सभी ने भय पूरक मेरे शरीर से उत्पन्न उस बालक के क्रिया कलापों का वर्णन किया..की किस प्रकार उस बालक ने सभी को भयं तरस दिया और अनेकों का भक्षण कर लिया..
यह सुकर मेने उस बालक को बुलाया और उससे पूछा की ऐसा क्यों कर रहे हो..???

तब उस बालक ने कहा की प्रभु में कोनसा काम करूँ..?? 
मेने उसे समझाया को जगत को त्रास मत दो.. 
ऐसा कहकर मेने उसे बार-बार समझाया..मेने उसे कहा की मेरे शरीर की राजस प्रकृति से तुम्हारा जन्म हुआ हैं..इसीलिए तुम्हारा नाम अंगारक हुआ हैं तुम लोगो का मंगल करो,उन्हें प्रसन्न और आनंदित रखो यही तुम्हारा कर्म हैं...  इस समय तुमसे भूलवश वक्री (कठिन) कार्य हुए हैं इसलिए विद्वान लोग तुम्हें "वक्र" नाम से पुकारेंगे..   

इस प्रकार मेरे समझाने पर उस बालक ने पूछा की बिना आहार (भोजन) के मेरी तृप्ति कैसे होगी  ???
उसने कहा की हे देवाधिदेव आप मुझे अच्छा स्थान दो,स्वामित्व दो,शक्ति दो और आहार (भोजन) भी जल्दी से दे दो.. उस पुत्र के ऐसे वचन सुनकर मेने सोचा की यह पुत्र (बालक) हैं और प्रिय भी हैं..ऐसा विचार कर उत्तम स्थान "अक्षय" देना चाहिए..यह सोचकर मेने उसे अपनी गोद में बिठा लिया और प्रेम से कहा की हे पुत्र मेने तुझे  महाकाल वन (उज्जैन नगरी) में गंगेश्वर से पूर्व में स्थान दिया हैं..उस स्थान पर शिप्र और खगर्ता का शुभ संगम हुआ हैं..जब मेने गंगा को मस्तक पर धारण किया था उस समय वह प्रमाद से (गुस्से से) चन्द्र मंडल से नीचे गिरी थी (आई थी) तब वह महाकाल वन क्षेत्र में गिरी थी..उस समय गंगा आकाश से नीचे आई थी इसीलिए उसका नाम खगर्ता हुआ और इसीलिए मेने वहां पर अवतार लिया..में यहाँ पर लिंग मिर्टी (महादेव) के रूप में निवास करता हूँ..और सभी देवतादिक मेरी पूजा करते हैं..यह स्थान देवतों को भी दुर्लभ हैं अतः हैं प्रिय   पुत्र तुम शीघ्र वहां के लिए प्रस्थान करो..  और उस संगम पर मेरी पूजा करो वह संगम का स्थल तुम्हारे नाम से जग में प्रसिद्द होगा..और ग्रहों के बीच में तेरा आधिपत्य (स्वमित्व) होगा..तुझे मेने तीसरा स्थान दिया हैं..
वहां तुम्हें तृप्ति प्राप्त होगी..ग्रहों के बीच तुम्हारी पूजा होगी और तिथियों में मेने तुम्हें चतुर्थी तिथि हैं इस चतुर्थी को जो भी तुम्हारी प्रसन्नता के लिए  व्रत, शांति दक्षिणा सहित पूजन करेंगे...उससे तुम्हें तृप्ति होगी,भोजनं मिलेगा..और मेने तुम्हें वार मंगलवार दिया हैं जिससे सभी को मंगल की प्राप्ति होगी..जो भी मनुष्य मंगलवार को विद्यारम्भ करेगा,नए वस्त्राभूषण धारण करेगा या फिर शरीर पर तेल लगाएगा उसे इस सभी कर्मो का फल नहीं मिलेगा..मेरी कही बातें सुनकर उस वक्रांग मंगल पुत्र ने स्वीकार कर ली और उसका नाम अंगारकेश्वर हो गया..और इस प्रकार मेरे वचन अनुसार वह अवंतिकापुरी (वर्तमान उज्जैन,मध्यप्रदेश) में अवस्थित हो गया..

उस वक्रांग मंगल पुत्र ने जब शिप्रा जी के पावन तट पर रमणीय खगर्ता संगम पर मुझे लिंग रूप में देखा तो तो वह परम शांति को प्राप्त हो गया और मेने उसे देखकर आलिंगन किया..उसे आशीर्वाद दिया की हैं पुत्र तेरे सभी वांछित पूर्ण होंगे..हैं मंगल में तुझ से प्रसन्न हुँ..आज से तेरा नाम अंगारकेश्वर तीनो लोकों में प्रसिद्द होगा इसमें कोई संशय नहीं हैं..जो कोई भी मेरे दर्शन प्रतिदिन इस संमेश्वर के पास करेगा उसका इस पृथ्वी पर पुनः जन्म  नहीं होगा..जो मेरा पूजन मंगलवार के दिन इस "अंगारकेश्वर" पर करेंगे वह इस कलियुग में कृतार्थ हो जायेगा..इसमें कोई संशय नहीं हैं..जो लोग मंगलवार की चतुर्थी को मेरा व्रत,पूजन और दर्शन करेंगे वह इस घोर दुखों युक्त संसार में पुनः जन्म नहीं लेंगे..जब मंगलवार को अमावस्या हो तब खगर्ता संगम पर देवता पूजित हैं..उस दिन यहाँ दर्शन और पूजा-स्नान से वाराणसी,प्रयाग, गयाजी और करुक्षेत्र में एवं पुष्कर में स्नान-पूजन का जो पुण्य मिलता हैं उससे भी अधिक पुण्य फल यहाँ पूजन और दर्शन से प्राप्त होगा..










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स्कन्द पुराण के अनुसार श्री अंगारेश्वर महादेव की कथा---
स्कन्द पुराण के अनुसार भगवान शंकर का अंधकासुर राक्षस से इस स्थान पर भीषण संग्राम हुआ । राक्षस को भगवान शंकर का वरदान था कि उसके शरीर से एक बून्द रक्त भी पृथ्वी पर गिरने से अनेकों राक्षस उत्पन्न होगें । राक्षस ने देवता, ऋषी, मुनी और ब्राह्मणों को सताना शुरू किया तो वे सब घबरा कर ब्रह्ममाजी के पास गए । ब्रह्ममा जी ने विष्णु जी के पास भेज दिया । ये सभी देवता, ऋषी, मुनि भगवान भोलेनाथ के पास गए । भगवान भोलेनाथ स्वयं युद्ध लड़ने आए । लड़ते-लड़ते स्वयं थक गए । भगवान के ललाट से पसीने की एक बूंद पृथ्वी पर गिरी और धरती के गर्भ से अंगारक स्वरूप मंगल की उत्पत्ति हुई । भगवान शंकर ने जैसे ही राक्षस पर त्रिशुल से प्रहार किया तो मंगल भगवान ने राक्षस के सारे रक्त को स्वाहा कर दिया । 
भगवान मंगल का स्वरूप अंगार के समान लाल हैं । 
भगवान मंगल का स्वरूप अष्टावक के स्वरूप में हैं । 
मंगल भगवान अग्नितत्व हैं और मंगल विष्णु स्वरूप भी हैं । 
मंगल पूर्ण ब्रह्म हैं । भगवान भोलेनाथ ने मंगल को अवंतिका में महांकाल वन में तीसरा स्थान दिया हैं । 
मंगल का उत्पत्ति स्थल अंगारेश्वर, शिप्रा नदी के किनारे कर्क रेखा पर स्थित हैं । ऐसी मान्यता हैं कि यदि इस स्थान पर छेंद किया जाए तो उसका अन्तिम सिरा अमेरिका में निकलेगा ।
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ऐसे हुई अंगारक की उत्पत्ति-----

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नवग्रहों में विशेष स्थान रखने वाले मंगल ग्रह का जन्म स्थान उज्जैन यानि प्राचीन नगरी अवन्तिका को माना गया है। देश के सभी स्थानों से मंगल पीड़ा निवारण और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए लोग यहां आते हैं। जनमान्यताओं के अनुसार मंगल की जन्म स्थली पर भात पूजा कराने से मंगलजन्य कष्ट से व्यक्ति को शांति मिलती है। मंगल को नवग्रहों में सेनापति के पद से शुशोभित किया गया है। जन्म कुंडली में मंगल की प्रधानता जहां मंगल दोष उत्पन्न करती है, वहीं व्यक्ति को सेना, पुलिस या पराक्रमी पदो पर शुशोभित कर यश और कीर्ति भी दिलती है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मंगल पृथ्वी से अलग हुआ एक ग्रह है। इसीलिए इसे भूमि पुत्र माना गया है। इसे विष्णु पुत्र भी कहते हैं। स्कंध पुराण के अनुसार अवन्तिका में दैत्य अंधकासुर ने भगवान शिव की तपस्या कर यह वरदान प्राप्त किया था कि उसके शरीर से जितनी भी रक्त की बूंदे गिरेंगी वहां उतने ही राक्षस पैदा हो जाएंगे। वरदान के अनुसार तपस्या के बल पर अंधकासुर ने अपार शक्ति प्राप्त कर ली और पृवी पर वह अनियंत्रित उत्पाद मचाने लगा। उसके उत्पादों से बचने के लिए व इंद्रादि देवताओं की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव को उससे लड़ना पड़ा था। लड़ते-लड़ते जब शिव थक गए तो उनकेे ललाट से पसीने की बूंदें गिरी। इससे एक भारी विस्फोट हुआ और एक बालक अंगारक की उत्पत्ति हुई। इसी बालक ने दैत्य के रक्त को भस्म कर दिया और अंधकासुर का अंत हुआ।

एक अन्य कथा के अनुसार जब अंगारका का जन्म हुआ , तभी से वह वक्री कार्य करने लगा। इसकी उत्पत्ति के बाद भूकंप और ज्वालामुखी जैसे उत्पाद होने लगे और पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच गई। यह देख ऋषियों ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने अंगारक को अपने पास बुलाया और कहा तुम्हें पृथ्वी पर मंगल करने के लिए उत्पन्न किया गया है न कि अमंगल करने के लिए। इस पर मंगल ने कहा कि यदि पृथ्वी का अमंगल रोककर मंगल करना है तो आप मुझे शक्ति और सामथ्र्य दीजिए। 

इस पर भगवान शिव ने अंगारक को तपस्या करने का आदेश दिया। अंकारक ने पूछा कि मैं किस स्थान पर तपस्या करूं? इस पर भगवान शिव ने कहा महाकाल के वन क्षेत्र में खरगता के संगम पर तपस्या करो। भगवान शिव के आदेश पर मंगल ने 16,000 वर्ष तक घोर तपस्या की। मंगल की तपस्या से भगवान शंकर प्रसन्न हुए और मंगल को ग्रहों का सेनापति बना दिया। नवग्रहों में इसे तीसरा स्थान प्रदान किया। अंगारक के पूछने पर कि मेरा पूजन कहां होगा तथा मेरा प्रभाव क्या होगा? इस पर शिव ने कहा कि मेरे लिंग पर आकर तुमने तप किया है। इसलिए यह लिंग तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा। तुम मनुष्य मात्र की कुंडलियों में योग कारक रहोगे। योग की अनुकूलता के लिए जो व्यक्ति यहां (अवंन्तिका) आकर तुम्हारी पूजा करेगा, उसका मंगल होगा। तभी से लोग मंगल की पूजा के लिए उज्जैन  में आते हैं और अपनी श्रद्धा अनुसार अंगारेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करके मंगल की अनुकूलता प्राप्त करते हैं। 

विशेष:--- किसी अनुभवी और विद्वान ज्योतिषी से चर्चा करके ही श्री अंगारेश्वर महादेव पर मंगलदोष निवारण के उपाय भात पूजन आदि करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।

शुक्रवार, अगस्त 31, 2012

ज्योतिष में मंगल ग्रह का महत्त्व-(मंगल, अमंगल (मंगलदोष )और अन्य मंगलीक प्रभाव/योग)------


ज्योतिष में मंगल ग्रह का महत्त्व-(मंगल, अमंगल (मंगलदोष )और अन्य मंगलीक प्रभाव/योग)------

---मंगल ग्रह को पृथ्वी का पुत्र कहा जाता है I ग्रहों में मंगल का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है I हमारे शरीर में मंगल रक्त में निवास करता है I जो व्यक्ति खेलकूद जैसे कि कुश्ती, क्रिकेट, बाक्सिंग आदि के खिलाड़ी होते हैं वे मंगल के अधीन आते हैं I सेना में अधिकारी, पुलिस, सर्जन इत्यादि मंगल के अधीन होते हैं I मंगल के साथ शनि का संयोग व्यक्ति को डाक्टर बनाता है यदि मंगल अधिक बलवान हो तो वह सफल डाक्टर बनता है तथा उसका कार्य चीरफाड़ से सम्बंधित होता है  I  शनि अगर अधिक बलवान हो तो दोनों के संयोग से कारावास या जेल से सम्बंधित आजीविका होती है  I इस सन्दर्भ में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि शनि व मंगल किस नक्षत्र में हैं और उनके अंश कितने हैं या उनका बल कितना है दोनों में से कौन अधिक बलवान है I मंगल व शनि को एक दूसरे का शत्रु माना जाता है परन्तु एक साथ जन्म कुंडली में इन दोनों के किसी भी स्थान में बैठे होने से बहुत से योग बनते तथा बिगड़ते हैं I अगर दोनों साथ बैठे हैं तो समझ लेना चाहिए कि मांगलिक योग होगा भी तो उसका प्रभाव कम हो जाएगा I फिर भी ऐसे जातक जातिका का विवाह मंगलीक से ही होना चाहिए  ...

---भारतीय वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को मुख्य तौर पर ताकत और मर्दानगी का कारक माना जाता है। मंगल प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक ताकत तथा मानसिक शक्ति एवम मजबूती का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानसिक शक्ति का अभिप्राय यहां पर निर्णय लेने की क्षमता और उस निर्णय पर टिके रहने की क्षमता से है। मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लेने में तथा उस निर्णय को व्यवहारिक रूप देने में भली प्रकार से सक्षम होते हैं। ऐसे जातक सामान्यतया किसी भी प्रकार के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकते तथा इनके उपर दबाव डालकर अपनी बात मनवा लेना बहुत कठिन होता है और इन्हें दबाव की अपेक्षा तर्क देकर समझा लेना ही उचित होता है। 

----मंगल आम तौर पर ऐसे क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें साहस, शारीरिक बल, मानसिक क्षमता आदि की आवश्यकता पड़ती है जैसे कि पुलिस की नौकरी, सेना की नौकरी, अर्ध-सैनिक बलों की नौकरी, अग्नि-शमन सेवाएं, खेलों में शारीरिक बल तथा क्षमता की परख करने वाले खेल जैसे कि कुश्ती, दंगल, टैनिस, फुटबाल, मुक्केबाजी तथा ऐसे ही अन्य कई खेल जो बहुत सी शारीरिक उर्जा तथा क्षमता की मांग करते हैं। इसके अतिरिक्त मंगल ऐसे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों के भी कारक होते हैं जिनमें हथियारों अथवा औजारों का प्रयोग होता है जैसे हथियारों के बल पर प्रभाव जमाने वाले गिरोह, शल्य चिकित्सा करने वाले चिकित्सक तथा दंत चिकित्सक जो चिकित्सा के लिए धातु से बने औजारों का प्रयोग करते हैं, मशीनों को ठीक करने वाले मैकेनिक जो औजारों का प्रयोग करते हैं तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्र एवम इनमे काम करने वाले लोग। इसके अतिरिक्त मंगल भाइयों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से छोटे भाइयों के। मंगल पुरूषों की कुंडली में दोस्तों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से उन दोस्तों के जो जातक के बहुत अच्छे मित्र हों तथा जिन्हें भाइयों के समान ही समझा जा सके। 
----मंगल एक शुष्क तथा आग्नेय ग्रह हैं तथा मानव के शरीर में मंगल अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल मनुष्य के शरीर में कुछ सीमा तक जल तत्व का प्रतिनिधित्व भी करते हैं क्योंकि मंगल रक्त के सीधे कारक माने जाते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए मंगल को पुरूष ग्रह माना जाता है। मंगल मकर राशि में स्थित होने पर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा मकर में स्थित मंगल को उच्च का मंगल भी कहा जाता है। मकर के अतिरिक्त मंगल को मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्थित होने से भी अतिरिक्त बल मिलता है जोकि मंगल की अपनी राशियां हैं।  
----मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक शारीरिक रूप से बलवान तथा साहसी होते हैं। ऐसे जातक स्वभाव से जुझारू होते हैं तथा विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत से काम लेते हैं तथा सफलता प्राप्त करने के लिए बार-बार प्रयत्न करते रहते हैं और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं तथा मुश्किलों के कारण आसानी से विचलित नहीं होते। मंगल का कुंडली में विशेष प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को तर्क के आधार पर बहस करने की विशेष क्षमता प्रदान करता है जिसके कारण जातक एक अच्छा वकील अथवा बहुत अच्छा वक्ता भी बन सकता है। मंगल के प्रभाव में वक्ता बनने वाले लोगों के वक्तव्य आम तौर पर क्रांतिकारी ही होते हैं तथा ऐसे लोग अपने वक्तव्यों के माध्यम से ही जन-समुदाय तथा समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम होते हैं। युद्ध-काल के समय अपनी वीरता के बल पर समस्त जगत को प्रभावित करने वाले जातक मुख्य तौर पर मंगल के प्रबल प्रभाव में ही पाए जाते हैं।   
-----कर्क राशि में स्थित होने पर मंगल बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी कमजोर हो सकते हैं। कुंडली में मंगल की बलहीनता कुंडली धारक की शारीरिक तथा मानसिक उर्जा पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है तथा इसके अतिरिक्त जातक रक्त-विकार संबधित बिमारियों, तव्चा के रोगों, चोटों तथा अन्य ऐसे बिमारीयों से पीडित हो सकता है जिसके कारण जातक के शरीर की चीर-फाड़ हो सकती है तथा अत्याधिक मात्रा में रक्त भी बह सकता है। मंगल पर किन्हीं विशेष ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण जातक किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में अपने शरीर का कोई अंग भी गंवा सकता है। इसके अतिरिक्त कुंडली में मंगल की बलहीनता जातक को सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन, तथा निर्णय लेने में अक्षमता जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकती है।  
----राहू मंगल के संयोग से व्यक्ति जासूस बनता है I मंगल अधिक बलवान हो तो निश्चित ही व्यक्ति सफल जासूस होता है या फिर किसी गुप्तचर एजेंसी में कार्यरत होता है I राहू के बलवान होने कि स्थिति में मंगल को नुक्सान पहुंचता है व मंगल राहू के योग से जुए या शराबखाने में, हथियारों की फैक्ट्री में काम करता है I ऐसा व्यक्ति गद्दार, आतंकवादी, चोर, मुखबिर, धोखेबाज तथा कातिल हो सकता है I
----चन्द्र मंगल के योग वाला व्यक्ति नेवी में अफसर होता है I मंगल का अधिक बलवान होना तथा चन्द्र का भी मित्र राशी में होना इस योग के लिए आवश्यक है I अभिप्राय यह है कि चन्द्र पानी का तथा मंगल सेना का प्रतिनिधित्व करते हैं I अगर इन दोनों के योग से व्यक्ति कुछ बनता है तो मंगल बलवान होने की स्थिति में वह जलसेना में तथा चन्द्र बलवान होने पर समुद्री जहाज में अपनी आजीविका प्राप्त करता है I वह प्रयोगशाला में वैज्ञानिक (चन्द्र के बहुत अधिक बलवान होने पर) या ब्लड बैंक में डाक्टर हो सकता है I
----बुध मंगल से व्यक्ति चालाक ठग या चोर बनता है I इसके लिए बुध का बलवान होना आवश्यक है I राहू का भी यदि इस योग में योगदान हो तो निश्चित ही व्यक्ति चोरों का नेता या ठग होता है I क्योंकि बुध चालाकी के लिए जाना जाता है और अगर उसे मंगल का साहस या शक्ति प्राप्त हो जाए तो उसकी हिम्मत बढ़ जाती है और चूंकि दोनों परस्पर शत्रु हैं इसलिए इन दोनों का योग व्यक्ति पर बुरा पड़ने कि संभावना बढ़ जाती है तथा राहू इस योग में आग में घी का काम करता है I इससे नकारात्मक प्रभाव निश्चित हो जाता है और व्यक्ति बुराई कि तरफ चल पड़ता है इ
----गुरु मंगल व्यक्ति को सेना में ट्रेनिंग देने वाला पद दिलवाते हैं I गुरु शिक्षक होता है I उसका काम शिक्षा देना है क्योंकि वह वास्तव में गुरु है I गुरु मंगल के योग में अगर गुरु बलवान हो तो सेना या पुलिस में होते हुए भी वह आधिकारिक पद पर तैनात रहता है I गजेटेड आफिसर का पद भी गुरु कि ही देन होता है I
----केतु मंगल से व्यक्ति अग्नि से सम्बंधित कार्यों में आजीविका प्राप्त करता है I
----सूर्य मंगल से व्यक्ति हड्डियों का डाक्टर बन सकता है इ
-----मेष लग्न में मंगल लग्न, दशम, नवम, पंचम, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। वृषभ में तृतीय भाव में सुख, चतुर्थ और नवम भाव में शुभ परिणाम देगा, मिथुन लग्न में एकादश, दशम, पंचम, षष्ट भाव में अनुकूल परिणाम मिलेंगे। कर्क लग्न में पंचम, नवम, सप्तम तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। सिंह लग्न में नवम पंचम, लग्न चतुर्थ, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। कन्या लग्न में चतुर्थ भाव में कुछ शुभ परिणाम देगा।

----तुला लग्न में अकाकर होगा, वृश्चिक लग्न में पंचम लग्न में हो तो शुभ परिणाम देगा। धनु लग्न में, पंचम भाव में नवम भाव में, चतुर्थ भाव में, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। मकर लग्न में स्थिति अनुसार स्वयं को परिणाम मिलेंगे। कुंभ लग्न में सप्तम, चतुर्थ दशम पंचम भाव में द्वादश भाव में परिणाम शुभ रहेंगे।

----मीन लग्न में लग्न नवम, दशम, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। इसी प्रकार शुक्र की स्थिति अनुकूल रही तो परिणाम दोगुने होंगे। भारत के राष्ट्रपति रहे स्वर्गीय डॉ. राजेंद्रप्रसाद मृगशिरा नक्षत्र के प्रथम चरण में हुए थे। आपकी पत्रिका में धनु लग्न की होकर पंचमेश नक्षत्र स्वामी मंगल लग्न में दशमेश बुध के साथ था, वहीं शुक्र राशि स्वामी एकादश भाव में स्वराशि तुला का था।

-----लग्नेश गुरु की स्थिति भाग्य नवम भाव में थी वहीं राहू दशम भाव में मित्र राशि का था। आपको मंगल के बाद राहू गुरु का परिणाम अति शुभ परिणाम देने वाला साबित होकर भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुँचे।
-----मंगल यदि अनुकूल स्थिति में हो तो कष्ट नहीं होता। यदि मंगल नीच राशि में होकर द्वितीय या सप्तम या अष्टम भाव में हो तो जन्म के समय मृत्युतुल्य कष्ट भोगना पड़ता है। इस नक्षत्र में पड़ने वाले नाम वे, वो है। मंगल के बाद राहू, फिर गुरु की महादशा चलती है। मंगल जहाँ कम समय के लिए हैं, वही राहू की महादशा बाल्यावस्था से लेकर युवा होने तक चल सकती है, अतः राहू की स्थिति को भी जान लेना होगा। राहू यदि जन्म पत्रिका में नीच का या अशुभ स्थिति में हो तो उस बालक का बचपन उद्दण्ड तरीके से व्यतीत होगा ही, इसके बाद उसमें बदलाव आकार सुधार आएगा, लेकिन पढ़ाई की उम्र निकल जाएगी और फिर वह बालक पढ़ने में ध्यान नहीं लगाएगा।
------मंगलदोष केसे देखें एवं क्या होंगे प्रभाव ---
-----किसी भी कुंडली में मंगल दोष हो व मंगल की महादशा में मंगल का अंतर चल रहा हो या मंगल की महादशा में शनि का अंतर हो या मंगल की महादशा में दूसरी स्थान की राशि के स्वामी या सातवें स्थान की राशि का अंतर हो तो विवाह से बचना चाहिए नहीं तो दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है। 
---मंगल के साथ शनि 1, 4, 7, 8 का भाव 12 में हो या फिर मारक भाव 2 में हो तो विवाह में सावधानी रखना चाहिए। शनि की मंगल पर तीसरी, सातवीं या दसवीं दृष्टि पड़ती हो तो विवाह में कुंडली को अवश्य मिलाना चाहिए। 

-----मंगल-शनि का योग तब तक कष्ट नहीं देता है जब तक वह एक-दूसरे की राशि में हो या इनमें से किसी एक ग्रह पर गुरु की दृष्टि पड़ती हो। उपरोक्त सभी नियम वर-वधू दोनों पर प्रभावी होते हैं। यदि कुंडली मिलान कर विवाह किया जाए तो भावी दुर्घटना से बचा जा सकता है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए मंगल दोष को नजरंदाज ना करें।
------मंगल दोष यूँ तो जन्म लग्न, लग्न से 4, 7, 8 व 12 भाव में मंगल हो तो वह माँगलिक पत्रिका मानी जाती है। लेकिन मंगल दोष में एक और भाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वो है द्वितीय मारक भाव यदि इस भाव में मंगल है तो माँगलिक दोष माना जाएगा।
-------मंगल यदि लड़के की कुंडली में लग्न में हो तो उसे लड़की की कुंडली में 4 या 7 भाव में देखना चाहिए। जिसकी कुंडली में मंगल पर गुरु की दृष्टि पड़ती हो या मंगल-गुरु के साथ हो तो मंगल दोष नहीं लगता। लड़की की कुंडली में भाव 2 में गुरु हो तो भी मंगल दोष नहीं लगता, क्योंकि स्त्री की कुंडली का द्वितीय भाव उसके भावी जीवनसाथी की आयु का होता है। 
ध्यान दीजिये इन वनोषधियों के प्रयोग से होता हें मंगल दोष/योग में लाभ----
सौर मंडल में सूर्य के बाद दूसरा सबसे उग्र ग्रह मंगल ही है। यह धरती का बेटा है। इसीलिए इसका एक नाम भौम भी है। इसे कुज एवं वक्र के नाम से भी जाना जाता है। अन्य ग्रहों की तरह यह भी कुंडली में बारहों भावों में भ्रमण करता रहता है। स्थिति, योग एवं संबंध के अनुरूप जातक को फल देता रहता है। 

इससे उत्पन्न दोषों की शान्ति हेतु समृद्ध प्रकृति के पास वनौषधि भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आयुर्वेद में इसका कई जगहों पर उल्लेख हुआ है। मंगल से संबंधित वनस्पतियों का उल्लेख प्रस्तुत है। आचार्य मणिबंध कृत 'पाकनिर्झरा' में बताया गया है कि-

'मौद्गल्योऽथकुटिलः प्रेतस्‌ त्रिजातेक्षु पिंकरादुधी। जानक्योऽविराभूता पुंकरस्रग्ध दक्षा कुजाः।' 

इसका विशेष विवरण निम्न प्रकार है।
1. मौद्गल्य- इसका वास्तविक नाम उदाल है। किन्तु शास्त्रों में इसे मौद्गल्य के नाम से जाना जाता है। कारण यह है कि सर्वप्रथम मुद्गल ऋषि ने अपनी पालिता पुत्री विभावरी की शादी मात्र इसलिए कर सकने में असमर्थ थे कि विभावरी की जन्मकुंडली में प्रथम भाव में मंगल-कर्क राशि का एवं सातवें भाव में गुरु, सूर्य, मकर राशि का होकर बैठे थे। 

मंगल पर पवित्र ग्रह गुरु की दृष्टि होने के बावजूद भी मांगलिक दोष की प्रचंडता के कारण उसकी शादी बाधित हो रही थी। फिर तपोबल से ऋषि ने इस मंगल की औषधि को ढूँढा। इसीलिए इसका नाम मौद्गल्य पड़ गया। मोटे तथा छोटे एवं गोल पत्तों वाला यह पौधा परजीवी होता है। 

यह अक्सर बड़े पेड़ों के कोटरों, या कही अगर किसी पेड़ के किसी हिस्से में मिट्टी जमा हो गई तो उस मिट्टी में अपने आप उग जाता है। इसमें फल एवं फूल लगते हैं। किन्तु इसका बीज कहीं बोने से नहीं अंकुरित होता। यह तमिलनाडु, आँध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि दक्षिणी प्रदेश में ज्यादा पाया जाता है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रथम भाव में मंगल दोष देने वाला हो गया हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

2. कुटिल- इसे स्थानीय भाषाओं में कटैला कहते हैं। इसके काँटे टेढ़े होते हैं। यदि कपड़े में फँस जाते हैं। तो बहुत ही कठिनाई से निकलते हैं। इसका तना पतला, हरा एवं पत्ते बहुत छोटे होते हैं। यह झाड़ी के आकार का होता है। मध्य भारत के प्रत्येक क्षेत्र में यह पाया जाता है। यह देहात में फोड़े-फुँसी की बहुत ही प्रचलित औषधि है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में दूसरे भाव में मंगल के कारण वाणी दोष, चर्मरोग या वित्तपात दोष हो तो इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है।

3. प्रेतस्‌- इसका स्थानीय नाम पितैला या तिलैया है। इसके पूरे तने पर सफेद रोम भरे पड़े होते हैं। यह पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके कोमल नवोदित पत्तों की बहुत लोग सब्जी भी बनाते हैं। इसका पत्ता चबाने पर खट्टे स्वाद का होता है। भाई बंधु या संबंधियों को पीड़ा हो या कुंडली में मंगल के तीसरे स्थान में बैठने के कारण यदि हमेशा भय बना रहता हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

4. त्रिजात- इसे राजस्थान में लोंठ, मध्यप्रदेश में मलीठा, तथा बंगाल, बिहार एवं उत्तरप्रदेश में तिनपतियाँ के नाम से जाना जाता है। इसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट होती है। इसके पत्ते अरहर के पत्ते के समान होते हैं। यह चूहों का परम प्रिय भोजन है। इसका पेड़ जहाँ पर होता है। वहाँ पर अमूमन चूहे अपना बिल बना लेते हैं। कुंडली में चौथे भाव में मंगल के कारण दोषयुक्त हुई कुंडली के दोष निवारण हेतु इसका प्रयोग होता है। इसे वैधव्य दोष निवारण की बहुत सशक्त औषधि मानी जाती है।


5. इक्षु- गन्ने या ईख को इक्षु कहा जाता है। यह किसान की सर्वविदित फसल है। शास्त्रों में मंगल के पाँचवें भाव के दोष निवारण हेतु मंगल की चतुर्भुजी मूर्ति बनाकर ईख के रस से स्नान कराने की विधि बताई गई है। यह वीर्य, ओज एवं रसवर्धक माना गया है। संतान बाधा एवं देवदोष निवारण में इसका प्रयोग किया जाता है।

6. पिंकर- औषधि विज्ञान में इसे सरसों की एक प्रजाति बताई गई है। किन्तु सरसों दो रंगों का होता है। पीले वाले सरसों का प्रयोग निषिद्ध माना गया है। यहाँ लाल रंग वाला सरसों ही गुणकारी है। छठे भाव के मंगल कृत दोष निवारण हेतु यह प्रयोग में लाया जाता है। 

7. आदुधी- इसे दुधिया भी कहते हैं। इसका रूप रंग ब्राह्मी घास जैसा होता है। यह जमीन पर फैल कर आगे बढ़ता है। पत्ते बिल्कुल छोटे होते हैं। इसे कहीं से तोड़ने पर दूध बहने लगता है। सातवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न मांगलिक दोष एवं दाम्पत्य जीवन की कटुता के निवारण हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। 

8. जानकी- इसे देहाती भाषा में दाँतर कहा जाता है। लगातार कभी न अच्छे होने वाले रोग एवं उग्र वैधव्य दोष के अलावा पति अथवा पत्नी की लम्बी उम्र के लिए इसका दातुन करते हैं। लंका निवास के दौरान माता जानकी भगवान राम की लम्बी उम्र के लिए इसी का दातुन करती थी। यह सिंहल द्वीप की औषधि है। अन्यत्र यह उपलब्ध नहीं है। 

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार यह एक खूबसूरत पत्तों वाला टहनीदार किन्तु कसैले स्वाद वाला वृक्ष है। नासूर एवं भगन्दर आदि रोगों की रामबाण औषधि मानी गई है। आठवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न दोष के निवारण हेतु इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है। 

9. अविराभ- सम्भवतः यह भटकटैया ही है। इसके पत्ते चिकने, गोल, तना छोटा, फल गोल कोमल छिलके वाले, स्वाद मीठा एवं टहनीदार झाड़ी के आकार का पौधा बताया गया है। इसके फल का रंग सिन्दूरी, लाल अथवा कत्थई होता है। बताया गया है कि इसका फल कवचावृत अर्थात किसी ढक्कनदार आवरण से ढका होता है। मंगल के कारण उत्पन्न भाग्य एवं धर्म दोष का निवारण इससे होता है। 

10. पुंकर- इसका एक नाम प्लक्ष भी है। यह एक अतिप्रचलित वृक्ष है। इसके पत्ते तोड़ने पर दूध बहने लगता है। कहीं-कहीं देहातों में इसके नवोदित कोमल कलियों की सब्जी भी बनाई जाती है। बरगद के फल के समान इसके फल होते हैं। मैदानी इलाके में यह ज्यादा पाया जाता है। 

इस वृक्ष के साथ पीपल एवं बरगद का पेड़ हो तो यह तीनों मिलकर हरिशंकरी के नाम से जाने जाते हैं। जिसकी पूजा की जाती है। पिता या नौकरी के संबंध में यदि मंगल के कारण कोई बाधा पहुँचती हो। अथवा दशम भाव संबंधी कोई मंगल कृत दोष हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

11. सरगंध- इसे सरपत भी कहते हैं। गाँव देहात में इसका प्रयोग छप्पर डालने के लिए किया जाता है। यह अक्सर नदी तालाब के किनारे पाया जाता है। इसके पत्तों की धार बहुत तेज होती है। इसके तने से बहुत दिनों पहले छोटे बच्चे कलम बनाकर लिखने का काम लेते थे। मंगल के कारण आमदनी में बाधा पहुँचती हो अथवा संतान संबंधी कष्ट हो या मंगल के कारण कुंडली का ग्यारहवाँ भाव दूषित हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

12. दक्ष- इसे दो नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र के सुदूर दक्षिणी प्रान्तों में इसे कहीं-कहीं आलू कहते हैं। गुजरात के खंभात इलाके में इसे कन्द के लिए प्रयुक्त करते हैं। जम्मू में भी इसे शकरकन्द के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। किन्तु केरल में इसे नारियल के अन्दर वाले हिस्से को कहते हैं। 

आसाम एवं बंगाल में दाक्षी नाम का एक स्वतंत्र पौधा भी होता है। उड़ीसा में भी दाक्षी ही कहते हैं। दाक्षी एक जहरीला पौधा है। इसके पत्ते निचोड़कर लोग कीट पतंग मारने के काम में लाते हैं। ये दोनों ही वनस्पतियाँ बारहवें भाव के मंगल दोष को शान्त करती हैं।

शुभ फल/परिणाम भी देता हें मंगल( आर्थिक सुख का कारक होता हें)---

------एक तरफ मंगल जहाँ दाम्पत्य जीवन के लिए सबसे खराब ग्रह कहा गया है। तथा मांगलिक दोष के कारण वैवाहिक जीवन को तहस-नहस करने वाला कहा गया है वहीं पर यह मंगल आर्थिक सम्पन्नता एवं भूमि-भवन, वाहन आदि की समृद्धि को भी दर्शाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मंगल के द्वारा कुंडली मांगलिक होने पर दाम्पत्य जीवन को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। किन्तु यहाँ यह बात भी नहीं भूलना है कि इस मंगल का वैवाहिक जीवन पर दुष्प्रभाव तभी पड़ सकता है जब यह मंगल वास्तव में योग, भाव, राशि एवं दृष्टि संबंध के द्वारा अशुभ हो। 
------यदि मंगल इस प्रकार अशुभ नहीं है तो यही मंगल वैवाहिक जीवन को अत्यंत मधुर, सुखी एवं संपन्न बना देता है। मंगल चौथे अथवा सातवें भाव में बैठा हो तो कुंडली मांगलिक कहलाएगी ही। किन्तु यदि यही मंगल मेष राशि का होकर लग्न में सूर्य के साथ अथवा चौथे भाव में मकर राशि का होकर शनि के साथ हो तो वह व्यक्ति धन-धान्य से संपन्न होकर सबसे सुखी एवं शांत जीवन व्यतीत करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। इसी प्रकार यदि मंगल भले ही आठवें हो किन्तु लग्नेश एवं सप्तमेश की युति किसी भी केंद्र में हो तो उस जातक का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखी एवं यशस्वी होगा। 
-----मंगल भले ही बारहवें भाव में हो, किन्तु यदि गुरु या शुक्र में से कोई भी एक उच्चस्थ होकर एक-दूसरे के साथ किसी भी केंद्र में बैठा हो तो दाम्पत्य जीवन सुखी होगा, इसके विपरीत देखे तो दसवें भाव में मंगल रहने से कुंडली मांगलिक नहीं होती है। तो हम इस भाव में मंगल को उच्च मकर राशि में दसवें भाव में मान लेते हैं। तथा दशमेश को शुभ केंद्र लग्न में शुभ ग्रह बुध के साथ युति मान लेते हैं। इस प्रकार सभी तरह से मंगल के शुभ होने पर भी वैवाहिक जीवन अनर्थकारी हो जाता है। 
-----जातक दर-दर का भिखारी एवं जाति, समाज से बहिष्कृत हो जाता है। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं है कि अगर कुंडली में मंगल कमजोर हुआ तो आदमी गरीब हो जाता है। 
कहा जाता है की मंगल अगर आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो आदमी मांगलिक हो जाता है। किन्तु अगर मंगल आठवें या बारहवें भाव में अपने घर में हो या आठवें घर में बारहवें घर के स्वामी के साथ अथवा बारहवें घर में आठवें भाव के स्वामी के साथ हो तो आचार्य मीनराज के शब्दों में सरल एवं विमल नामक शुभ योग बनते हैं। कुंडली मांगलिक होने की मात्र कुछ एक शर्तें ही हैं। जिससे कुंडली मांगलिक हो जाती है। अन्यथा कुंडली में मंगल अगर पापपूर्ण अथवा अस्त आदि से कमजोर न हो तो जीवन धन-धान्य पूर्ण शांत एवं सुखी होता है। 
-----नाम के अनुरूप मंगल हमेशा मंगल ही करता है। परन्तु विविध भ्रांतियों ने इस देवग्रह की महिमा ही खंडित कर दी है। जो मंगल भूमि-भवन एवं वाहन का द्योतक है, जिस मंगल के कारण वंश वृद्धि होती है, जो मंगल स्थायी संपदा का द्योतक है, जो मंगल विवाह जैसा पवित्र बंधन प्रदान करता है। उस मंगल को इतना बदनाम कर दिया गया है की आम जनता इससे सदा भयभीत रहती है। यह जान लेना चाहिए की मंगल यदि कमजोर हो तो वंश वृद्धि रुक जाएगी। धन-संपदा नष्ट हो जाएगी। साहस एवं पराक्रम क्षीण हो जाएगा। 
------आचार्य व्याघ्र पाद के शब्दों में कुंडली मांगलिक प्रायः तभी होती है जब लग्न से पहले वाली राशि जन्म राशि हो अथवा अगली राशि जन्म राशि हो तथा मंगल मांगलिक सूचक भावों अथवा घरों में बैठा हो। अन्यथा मंगल चाहे कहीं भी क्यों न बैठा हो कुंडली मांगलिक नहीं हो सकती है। अपितु इसके विपरीत मंगल ऐश्वर्य एवं स्थायी धन-संपदा को देने वाला हो जाता है।
इनके उपयोग/प्रयोग द्वारा पायें मंगलदोष/योग से मुक्ति/छुटकारा----
-----किसी भी जन्म कुंडली में मंगल तीसरे, छठे और दसवें घर का कारक ग्रह है। इसका रंग लाल है। मंगल का प्रभाव दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर तो होता ही है साथ ही खाने की वस्तुओं पर भी पड़ता है। मंगल का प्रभाव ऐसी वस्तुओं पर होता है जिनका रंग मंगल की तरह होता है। मंगल का प्रभाव ऐसी वस्तुओं पर भी होता है जिनकी प्रकृति मंगल की तरह उत्तेजक होती है।
--------मंगल से प्रभावित भोज्य पदार्थ अनार, गाजर, मोठ, लाल चौलाई, चुकंदर, टमाटर, लौंग, मसूर, लाल मक्का आदि है। मंगल देव को प्रसन्न करने के लिए इन चिजों का दान दिया जाता है। दान देने के साथ ही अगर इनका सेवन भी किया जाए तो मंगल देव की कृपा बनी रहती है। हमारे शरीर में खून का कारक ग्रह भी मंगल होता है। अगर मंगल की वस्तुओं का सेवन करें तो शरीर में खून से सम्बन्धी सभी दोषों से मुक्ति मिल जाति है। मोठ को अंकुरित कर के रोज सुबह कच्चा चबा कर खाएं तो शरीर में खून के लाल कणों की वृद्धि होती है। सर्दियों में मक्की के आटे की रोटी खाएं। बादाम को भिगो कर रोज सुबह खाएं तो बल बढ़ता है। अगर आप मंगल की वस्तुएं खाएं तो मंगल वैसा ही प्रभाव करेगा जैसा कुंडली में उच्च राशि के साथ स्थित होकर करता है।
##### शुभम बवातु..कल्याण हो.....
पं0 दयानन्द शास्त्री
विनायक वास्तु एस्ट्रो शोध संस्थान ,
पुराने पावर हाऊस के पास, कसेरा बाजार,
झालरापाटन सिटी (राजस्थान) 326023
मो0 नं0 … 09024390067 ;09411190067 ;09711060179 ;